उच्य विद्यालय बड़हिया
उच्च विधालय बड़हिया – भूत एवं वर्तमान

उच्च विधालय बड़हिया का इतिहास बड़ा ही गौरवशाली रहा है। इस क्षेत्र में शिक्षा के प्रचार प्रसार में इसकी प्रमुख भूमिका रही है यह विधालय छ: जिलों से बना मुंगेर प्रमण्डल का पांचर्वी और वर्तमान लखीसराय जिला का प्रथम स्थापित विधालय है। इसकी स्थापना 1912 में उस समय हुई थी जब लोगो का शिक्षा के प्रति झुकाव कम था। कृषि प्रधान गाँव होने के कारण यहाँ के लोग पहलवानी को अधिक महत्व देते थे। यहाँ के पहलवान प्रदेश और देश स्तर के थे। यह सोचने की बात है कि यहाँ के लोगों का पहलवानी के साथ साथ शिक्षा के प्रति भी कितना लगाव एवं झुकाव था। बल के साथ विधा का अपूर्व संगम था-यह गाँव।

● बड़हिया क्षेत्र के वासी यहाँ के मारवाड़ी समाज के प्रति सदा आभारी रहेगें जिन्होने धर्मादा के पैसे से और गाँव के प्रबुद्ध लोगों के सहयोग से विधालय की स्थापना की और व्यवसिथत ढंग से भव्य भवन का निर्माण भी करवाया। विधालय का दो खण्डों वाला भव्य विशाल भवन एवं चार सीटों वाला अठाइस कमरें का छात्रावास इसकी भव्यता में चार चाँद लगाता है।

● छात्रावास के पीछे खेल के मैदान का भी खस महत्व है। तत्कालीन समय का प्रयोगशाला और पुस्तकालय भी काफी सम्पन्न था। शिक्षण व्यवस्था काफी अच्छी थी। योग्य अनुभवी और मेहनती शिक्षको की कमी नही थी। यहां कला विज्ञान एवंवाणिज्य की अलग अलग पढ़ाई की सुविधा थी। सिलाई कढ़ाई के लिए अलग से टेलर मास्टर बहाल था।

● श्री नेतराम तिवारी जैसे योग्य एवं कुशल प्रधानाअध्यापक का नेतृत्व था। शायद वह विधालय का स्वर्णिम काल था। विधालय का बोड परीक्षा परिणाम स्वर्णाक्षरों में लिखने लायक था। यहाँ के विधार्थी कई वर्षो तक बोर्ड परीक्षा में राज्य स्तर पर एक से दस के बीच अच्छे स्थान प्राप्त करते रहे। ऐसे विधाथियो में मुरारीनन्द तिवारी, सुमन तिवारी, कृष्णपाल सिंह, विपिन चतुर्वेदी आदि का नाम गर्व के साथ लिया जा सकता है एक से पचास के बीच तो हर वर्ष दो चार विधार्थी स्थान प्राप्त करते थे। लेकिन कालक्रम में सारे बिहार में कानून व्यवस्था की दुर्गति के कारण यहां की शिक्षा व्यवस्था पर भी कुप्रभाव पड़ा । विधालय का सम्पन्न प्रयोगशाला और पुस्तकालय एवं शिक्षण व्यवस्था भी प्राचीन गौरवशाली नालन्दा विश्वविधालय कीतरह ध्वस्त हो गयां विधालय भूत बंगला सा हो गया।

● कुछ वर्षो तक विधालय को विभिन्न संकटों से गुजरना पड़ा। इस कारण पढ़ाई और परीक्षा भी प्रभावित हुई। लेकिन पुन हाल के कुछ वर्षो में कानून व्यवस्था में सुधार के कारण विधालय अपना पुराना गौरव प्राप्त करने की दिशा में अग्रसार है। विधालय की शिक्षण सिथति में गुणात्मक सुधार हो रहा है। पिछले कुछ वषों से विधालय को परीक्षाफल में जिला में प्रथम स्थान प्राप्त करने का गौरव प्राप्त हो रहा है।

● लेकिन विधालय के सामने सबसे बड़ी समस्या शिक्षकों की घोर कमी रही है। जिस विधालय में कम से कम 20-25 शिक्षकों का होना आवश्यक है। वहाँ प्रधानाध्ध्यापक सहित मात्र सात शिक्षकों से चार सेेक्सनों में पढ़ाई का काम करना पड़ा है। अभिभावक का अपने बच्चों के नामंकन के प्रति अधिक झुकाव के कारण लड़के और लड़कियों की संख्या में उतरोतर आशातीत वृद्धि हो रही है। अधिकाधिक विधार्थियों को शिक्षकों की कमी से समुचित शिक्षा देना उनके लिए उपस्कार की तत्काल व्यवस्थ करना वास्तव में एक समस्या है।

● विधालय का सौ वर्ष का विशाल भवन जर्जर हो चुका है। किबाड़ और खिड़कियाँ टूट रही है। प्रधानाध्यापक का आवास खण्डहर में बदल रहा है खेल के मैदान की दीवरें बार बार आसामाजिक तत्वेां के द्वारा तोड़ दी जाती है। इसकी सुरक्षा के लिए प्रशासन के साथ साथ स्थानीय लोगों को भी कमर कसना होगा। यह सारे बड़हिया क्षेत्र में ज्ञान का प्रकाश फैलाने वाला एक वैभवशाली धरोहर है।

● जिस विधालय ने सौ वर्षों में अनेकों अनेक राजनेता, प्रशासक, इंजिनियर, डाक्टर, साहित्यकार आदि को पैदा कर उनके कद को बढ़ाने का कार्य किया है। आज स्वयं उसका कद छोटा होता जा रहा है। अपने बच्चों के उज्ज्वल भविष्य के लिए इस विधालय के कद को बढ़ाना ही पड़ेगा। ज्ञान की गंगा प्रवाहित करने वाली पुरखों की इस धरोहर की सुरक्षा एवं संरक्षण की जिम्मेवारी वर्तमान पीढ़ी पर हैं, अन्यथा आने वाली पीढ़ी वर्तमान पीढ़ी के बारे में गलत सोचेगी।

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