माँ बाला त्रिपुर सुंदरी
माँ जगदम्बा मां बाला त्रिपुर सुंदरी

गंगा के तट पर आम कुंजो के मध्य लखीसराय जिला अंतर्गत बड़हिया ग्राम बिहार राज्य के गाँवों का सिरमौर है। धन धान्य से परिपूर्ण और लाखो की आबादी वाला यह नगर हावड़ा दानापुर रेलखंड के मुख्यमार्ग पर स्थित है। बड़हिया स्टेशन पर प्राय: सभी गाडि़यो का ठहराव है। अत: देश के किसी भी कोने से यहां पहुंचने में यात्रियो को कठिनाई नही होती है। प्राकृतिक सुषमा में मंडित बड़हिया नगर के पूर्वी छोड़ पर मां बाला त्रिपुर सुंदरी एक भव्य संगमरमरी मंदिर में अपनी अलौकिक शक्तियों के साथ विराजती है। इस मंदिर की ऊंचाई 151 फीट है तथा स्वर्ण कलश के साथ 167 फीट है जो बिहार का सबसे ऊँचा मंदिर है मंदिर में विद्वान पंडितो द्वारा प्रात: और सांय मां की पूजा आरती नियमित रूप से की जाती है मंदिर का संगमरमर से बना होना एंव गुम्बज पर स्वर्ण कलश स्थापित हो जाने से मंदिर की शोभा देखते ही बनती है।

● वासंती और शारदीय नवरात्रों में हजाड़ो की संख्या में श्रद्धालु भक्त मां के दर्शन में उपस्थित होकर मनोवांछित फल की प्राप्ति करते है पूरे नवरात्र में दुर्गा सत्तशती के मंत्रो से मंदिर गुंजायमान रहता है मां जगदम्बा पूजा समिति के तत्वाधान में क्षेत्रीय एवं ग्रामीण लोगों द्वारा दोंनो नवरात्री में श्रद्धापूर्वक मां की पूजा अर्चना की जाती है मंदिर की प्रथम पंजिल पर स्थापित नवदुर्गा की प्रतिमांए श्रद्धालु भक्तजनो में भक्ति भावना का संचार करती है दूर दराज के भक्तो को विश्राम हेतु मंदिर के मुख्य द्वार के ठीक सामने एक धर्मशाला का निर्माण किया गया है जिसमें पानी बिजली शौचालय आदि का प्रबंध है तथा अत्यधिक सेवा के लिए दूसरा धर्मशाला भक्त श्रीधर सेवा आश्रम मंदिर के निकट ही निर्माणधीन है।

● श्री कामराज विधा की अधिष्ठात्री श्री विधा का ही रूपांतर त्रिपुर है। त्रिमुतियो से पुरा पुरातन होने से त्रिपुरा अथार्त गुणतयातीता त्रिगुण नियन्त्रीशाक्ता गौंड़पादीय सूत्र से भी कहा गया है।

● अत: त्रिमातृ रूप में जगजननी और अद्र्धमात्र रूप में परा जननी है बाह्राणी रौद्री और वैष्णवी की समिष्ट मूर्ति त्रिपुर सुंदरी है, बह्रा विष्णु और शिव की सृष्टि से पूर्वी मा विधमान स्वर्ग, पृथ्वी और पाताल के लय हाने पर भी पुन: निर्माण कर देने वाली भगवती का नाम त्रिपुरा है।

● उन्ही तीनों लोको की माता त्रिपुर जननी भगवती के त्रिपुरा कहते है बाला अथवा बाला त्रिपुरा संदरी के ही भिन्न रूप है बाला का अर्थ होता है कुमारी अथवा छोटी लड़की।

● जो शक्ति विष्वो तीर्णा है अर्थात विश्व के बाहर रहती है वह महात्रिपुर सुंदरी है और जब वही शक्ति कामेश्वर के साथ विश्वारिमका होती है तो बाला कही जाती है। त्रिपुरा रहष्य के पैतालीसवें अध्याय में जो व्याख्या त्रिपुरा की दी गइ्र है, उससे प्रमाणित होता है कि भगवती दुर्गा भी त्रिपुरा के अंश से संमुदभूत हुई है, उन्होंने देवताओं को दुर्गति से बचाया और उनके स्मरण से संकट टल जाता है इसलिए दुर्गा कही जाती है।

● संकेत पद्धति में तथा वामकेश्वर तंत्र में त्रिपुरा का स्वरूप इस प्रकार वर्णित अंकित है ब्रहा्र, विष्णु, ईर्श रूपिणी। श्री विधा के ही ज्ञान शक्ति कि्रया शाकित और इच्छा शाकित ये तीन स्वरूप् है। इच्छाा शाकित उसका शिरोभाग है ज्ञान शाकित मध्य भाग तथा क्रिया शाकित अधोगभाग है एवं प्रकार के शाकित त्रयात्मक उसका रूप् होने से वह त्रिपुरा कही जाती है। आत्माशक्ति ही त्रिपुर सुंदरी है ”हरितायन संहिता में श्री दतात्रेय गुरू ने परशुरामजी से त्रिपुर सुंदरी के स्वरूप् का निरूपण करते हुए कहा ‘हे राम उस पराशक्ति के महात्म्य का कौन बर्णन कर सकता है सर्वत्र सर्वशक्तिमान लोकेश्वर ब्रहा विष्णु महेष भी अभी तक उस शक्ति का ना स्वरूप जानते है न स्थान ही जानते है वस्तुत कोर्इ भी ऐसा वर्णन नहीं कर सकता वेद तंत्र औश्र शास्त्र तंत्र भी । त्रिपुर सुंदरी के अनेक नाम है त्रिपुरा, त्रिपुरेशाी, त्रिपुर, सुंदरी, त्रिपुरवासिनी, त्रिपुरश्री , त्रिपुरसिद्धा, त्रिपुर अम्बा और महा-त्रिपुर सुंदरी।

● इनके अवतार की कथा त्रिपुरा रहष्य में आयी है। ललिता अम्बा की अंशभूता पुत्री भगवती बाला अम्बासे भण्डासुर के तीस पुत्रों ने छ’ हजार अक्षौरहणी सेना के साथ संग्राम आरंभ किया। बाला भगवती का यह संग्राम कौतुक वर्णनातीत है। अंत में युद्ध कौशल से बाला अम्बा ने असुरो को परास्त किया । और सभी भंडपुत्र मारे गये। भण्डासुर जब पीछे युद्ध में उपस्थित हुआ तो भगवती को पहचान कर वाण फेंक कर चरणो की वंदना की।

● जिस त्रिपुर सुंदरी की अनुकम्पा से चतुर्मुखी ब्रम्हा सृष्टी रचना में सर्मथ होते है। विष्णु जिसके कृपा कटाक्ष से विश्व का पालन करते है और रूद्र जिसके बल से विश्व संहार करते है वही त्रिपुर सुंदरी बाला रूप में बड़हिया नगर के एक भव्य मंदिर में विराजती है भागवत में एक वचन आया है की गंगा के तट पर एक सिद्धपीठ है जो मंगलापीठ कहा जाता है बहुत संभव है की वह सिद्धपीठ यही स्थान है। जहां तक लोगों की जानकारी है की भारतवर्ष में गंगा के किनारे इस पीठ के अलावे कोर्इ मंगलापीठ नही है। देश के पंडितों,विद्वानो और श्रद्धालु भक्तों का ध्यान इस अनुसंधान की ओर जाना चाहिए।

माँ बाला त्रिपुर सुंदरी का संक्षिप्त इतिहास नीचे की पंक्तियों में वर्णित है। :-

●इस ग्राम में भगवती मां बाला त्रिपुर सुंदरी का प्रादुभवि कैसे हुआ, इसका इतिहास भी बड़ा रोचक है। शाक्तों के इतिहास में वह गौरवशाली दिवस था जब दो शाक्तबंधु श्री पृथु ठाकुर तथा श्री जय जय ठाकुर जगन्नाथपुरी को जाते हुए गंगा पार करके इस ग्राम में पहुंचे और रात्रि विश्राम के लिए यहाँ ठहर गए। ये सहोदर भ्राता मैथिल कुल भूषण थे। दरभंगा के समीप संदहपुर ग्राम में मैथिल ब्राह्ममणों के ’योग्य’ परिवार में इनका जन्म हुआ था। इसलिए इनका मूल दिघवैत संदहपु प्रख्यात हुआ। ये धर्मनिष्ठ, शास्त्र्ज्ञ और त्रिकालदर्शी थे। तंत्र शास्त्र के ये प्रकांड पंडित थे। बड़हिया ग्राम के जिस डीह पर वत्र्तमान त्रिपुर सुन्दर का मंदिर अवस्थित हैं, वहाँ इन लोगों ने मूषिका से विल्ली को पराजित होते देखा। इस वीर भूमि को देखकर इन्हें ज्ञान हो गया कि इस वीर भूमि पर माँ त्रिपुर सुन्दरी की अलौकिक शक्ति विराज रही है। भागवत में एक वचन आया है कि गंगा के तटपर भगवती का एक सिद्धपीठ है जो मंगलापीठ कहा जाता है। बहुत संभव है कि यह सिद्धपीठ यही स्थान है। जहाँ तक मेरी जानकारी है कि पूरे भारत वर्ष में गंगा के किनारे इस पीठ के सिवा और कोई मंगलापीठ नहीं है। देश के पंडितों, विद्वानों और श्रद्धालु भक्तों का ध्यान इस अनुसंधान की ओर जाना चाहिए।

● कुछ महीनों के बाद उक्त दोनों शाक्त बंधु जगन्नाथ जी के दर्शनोपरांत अपनी वापिसी की यात्रा में यहाँ ठहरकर उक्त तेजस्वी डीह की प्राप्ति का मार्ग ढूंढ़ने लगे। उस समय इस भू-भाग पर पालवंश (सातवीं शताब्दी) का एक प्रतापी इन्द्रधुम्न का आधिपत्य था और उनकी राजधानी लखीसराय स्टेशन के समीप ग्राम जयनगर में थी। वह अपने एक मात्र पुत्र की गलित कुष्ट व्याधि से उद्विग्न रहा करता था। दोनों शाक्त बंधु राजा से लिने जयनगर गए। इनके मसतक के ऊपर बिना आधार के तनी हुई सफेद चादर को देखकर जयनगर के लोग आश्चर्य चकित हो गए और इनकी महिमा से प्रभावित होकर लोगों ने राजा को इनके दर्शन में उपस्थित होने के लिए आग्रह किया। राजा ने इनसे पुत्र की जिन्दगी की भीख मांगी। इस आग्रह को स्वीकार कर दोनों शाक्त बंधुओं ने अपनी तंत्र-शक्ति से राजपुत्र को रोग मुक्त कर राजा से इस भू-भाग को प्राप्त कर लिया। इस भू-भाग पर बढ़ई जाति के लोग रह रहे थे। इसलिए यह भू-भाग बढ़ई जाति के लोग रह रहे थे। इसलिए यह भू-भाग बढ़ई ग्राम के नाम से जाना जाने लगा। कालान्तर में यह बड़हिया नाम से प्रसिद्ध हुआ।

● श्री जय जय ठाकुर कर्म-काण्ड के प्रकांड विद्वान थे और इनकी ख्याति इतनी फेल चुकी थी कि कर्म विशेष के अवसर पर आचार्यतव के लिए इनकी बुलाहट होने लगी। इन्हें जीने योग्य धन भी मिलने लगा। ये अपनी हिस्से की भूमि को भाई के नाम पर चढ़ाकर स्वयं पौरोहित्य करने लगे। फलतः इनके वंशज और पृथु ठाकुर के वंशज यहाँ क्रमशः मैथिल ब्राह्मण और भूमिहार ब्राह्मण के नाम से पुकारे जाने लगे। श्री जय जय ठाकुर ने पूजा-पाठ में अपने सगे भाइयों से दान लेना उचित नहीं समझा, अतः इन्होंने इस कर्म हेतु अपने जलेवार ब्राह्मण को बुलाकर यहाँ बसाया।

ब्राह्मण वंश में प्रातः स्मरणीय एवं त्रिपुर सुन्दरी के प्रतिष्ठाता श्री श्रीधर ओझा अवतरित हुए थे। इनकी जन्म-तिथि और काल के संबंध में कहीं कोई लिखित प्रमाण नहीं है। 1131 ई॰ में गीताप्रेस, गोरखपुर से प्रकाशित ‘भक्त चरित्रांक’ में इनके संबंध में कहा गया है कि ये बाल ब्रह्मचारी, सिद्ध तांत्रिक और श्मशानी थे। घर-परिवार से दूर रहकर ये गंगा के तटपर कुटिया में रहकर देवी के अनेक सिद्धियों को प्राप्तकर चुके थे। बड़हिया ग्राम-निर्माण के कई सौ वर्ष पूर्व से ही यहाँ देवी-साधना एवं धर्म-प्रचार में रत थे। उस समय इनकी ख्याति पूरे भारतवर्ष में फेल चुकी थी। समय-समय पर ये देश के विभिन्न भागों में पहुँचकर सिद्धियों से लोगों को चमत्कृत किया करते थे। कश्मीर की वैष्ण्वी देवी के प्रतिष्ठाता यहीं श्रीधर ओझा थे। वैष्णवी देवी की अवतार कथा में इनके नाम का उल्लेख हुआ है। बड़हिया ग्राम की त्रिपुर सुन्दरी की प्राण-प्रतिष्ठा करने वाले श्रीधर ओझा के जीवन-वृत में साम्य दीखता है। इस संबंध में देश के विद्वानों और अध्येताओं से गहन शोध् की अपेक्षा है। कश्मीर से लौटकर जब श्रीधर ओझा यहाँ आए, तब सुप्तावस्था में इन्हें एक दिन रात्रि में स्वप्न हुआ कि प्रातःकाल वह ज्योति स्वरूपा त्रिपुर सुन्दरी का दर्शन पावेंगे और वह ज्योति मृतिका के खप्पर में उन्हें गंगा में प्रवाहित होती दीख पडे़गी। इसी अवस्था में उनको यह भी प्रेरणा मिली की ज्योति स्वरूपा त्रिपुर सुन्दरी को प्रज्वलित शिखा के रूप में पावेंगे। उन्हें वह मृतिका पिन्ड में उनकी लीला भूमि में पधार कर पूज करें और इन्हीं भगवती की आराधना से संसार का दुःख दूर हो सकेगा।

● प्रातः काल जब प्राची के क्षितिज पर भगवान भास्कर उदयीमान हो रहे थे तो उनके अरूण किरण-जाल में ज्योति स्वरूपा भगवती मृतिका के खप्पर में पुण्य सलिला गंगा के प्रवाह में तिरोहित होने लगी। श्री श्रीधर ओझा के तंत्र-बल, शुद्ध चित्त, प्रकांड पांडित्य और तेजो ललाट पर रीझ कर देवी उनके समक्ष सदेह उपस्थित हो गई और आह्लादित स्वर में उसने श्रीधर ओझा को आदेश दिया- इस पुण्य भूमि पर तुम सपरिवार निवास करो। जबतक तुम कश्मीर से सपरिवार लौटोगे नहीं, तब तक मैं छाया रूप में इस गंगा-तट पर विराजती रहूँगी। देवी के आदेश से वे अपने परिवार को लाने कश्मीर का यात्रा पर निकल पड़े। वैष्ण्वी मंदिर से तीन-चार मील की दूरी पर उनका परिवार रहता था। यहाँ रात्रि में एक सुखद स्वप्न में वैष्णों देवी ने उन्हें आर्शीवाद देते हुए कहा- मेरी प्रेरणा से ही तुम्हें बड़हिया ग्राम के गंगातट पर त्रिपुर सुन्दरी के दर्शन हुए हैं। यह बाला रूप में सदैव तुम्हारी जन्मभूमि में विराजती रहेंगी। मेर और मेर अंश स्वरूपा त्रिपुर सुन्दरी के कारण तुम्हारा यश भी सदैव अक्षुझण रहेगा। वैष्णव देवी से आशीवा्रद प्राप्त कर श्रीधर ओझा सपरिवार लौट आए। उन्होंने अपनी तंत्र-विद्या ओर आराधना शक्ति से पुनः देवी को सदेह उपस्थित किया। सविधि पजन के बाद उन्होंने देवी के इस गाँव में सदैव विराजने की प्रार्थना की। माँ त्रिपुर सुन्दरी ने दो शर्तों के साथ उनकी विनती स्वीकार कर ली। प्रथम शर्त के अनुसार माँ त्रिपुर सुन्दरी गंगा की मिट्टी की पिण्डी में शास्त्रीय विधि से प्रतिष्ठित किया और इस प्रकार उस समय देवी प्रेरणा से मृतिका की चार पिण्डियाँ पधराई गई। इन्हीं चार पिण्डियों में क्रम से त्रिपुर सुन्दरी, महाकाली, महालक्षमी और महासरस्वती का पूजन-अर्चन होने लगा। श्रीधर ने भगवती के आदेशानुसार गंगा के तट पर जल-समाधि ले ली। उनकी फलीभूत साधना और अलौकिक विजय के कारण इस घाट का नाम ’विजय घाट’ पड़ गया। बाद में भक्तों ने उनकी समृति में उक्त चार पिण्डियों के उत्तरी भाग में एक मृतिका पिण्ड की स्थापना कर दी। एक बड़े मंदिर में अवस्थित अब कुल मिलाकर पाँच पिण्डियों का पूजन होता है।

स्थानीय श्री जगदम्बा हिन्दी पुस्तकालय की एक प्राचीन हस्तलिखित पोथी के अनुसार श्रीधर ओझा एक जलेवार ब्राह्मण थे। उनकी कई पीढि़याँ भक्ति और साधना के क्षेत्र्ा में ख्यात रहीं। आज भी श्रीधर ओझा के वंशज पूजा-पाठ से जीवकोपार्जन कर रहे हैं। कहा जाता है कि श्रीधर ओझा ने आस-पास के अन्य स्थानों में भी महाविद्याओं के प्रतीकों एवं विग्रहों की स्थापना की। उनमें हरूहर नदी के तट पर बड़हिया ग्राम-क्षेत्र में अवस्थित पाली ग्राम में परमेश्वरी की स्थापना की गई थी।

● त्रिपुर सुन्दरी ने अनेक अवसरों पर यहाँ के लोगों को मुसीबतों से बचाया है। प्राचीन काल में बड़हिया ग्राम झाडि़यों से आच्छादित था जिनमें विषैले सर्प बरसात के मौसम में जल-प्लावन होने पर इस गाँव में चढ़ आते थे और उनके काटने से अनेक प्राणियों की अकाल मृत्यु हो जाया करती थी। श्रीधर ओझा ने त्रिपुर सुन्दरी से यह वरदान प्राप्त किया था कि यहाँ के जो निवासी जगदम्बा का स्मरण करते हुए श्रीधर के वरदान की योजना वाक्यों में करके एक हाथ से कूप का नीर खींच कर सर्प दंश से पीडि़त प्राणी को पान करायेंगे वह सर्प विष से तत्काल मुक्त हो जाएगा। यह मंत्र अत्यन्त सरल और साधारण है – हरा हरा हरात दोष-दोष निर्विष, दहाय त्रिपुर सुन्दरी के, आज्ञा श्रीधर ओझा के आज तक यह वरदान सफल हो रहा है। सर्प-विष-निवृत्ति के लिए इससे बढ़कर कोई महौषधि नहीं। मंदिर में भगवती के सदेह निवास का यह पक्का प्रमाण है। मैं दावे के साथ कह सकता हूँ कि इस मंदिर के सिवा भारत वर्ष में कोई ऐसा अन्य मंदिर नहीं, जहाँ पहुँचने पर सद्यः फल प्राप्त होता हो। देशवासियों से मेरी विनम्र प्रार्थना है कि वे इस मंदिर में पहुँच कर सर्प दंशनिवारण में देवी ने फतह सिंह नामक व्यक्ति को कामगार खाँ से गाँव की रक्षा करने का आदेश दिया। प्रातः काल वे देवी का आदेश मानकर युद्ध कँ मैदान में उतर गए। इनके शौर्य और पराक्रम से पराजित होकर खाँ बंधु ग्राम से भाग निकले। यह कोई गप नहीं, एक सच है, क्योंकि इस घटना का उल्लेख मुंगेर जिला के गजेटियार में आया है।

● माँ त्रिपुर सुन्दरी बड़हिया ग्राम की कुल देवी हैं। यहाँ के लोगों का कोई भी शुभ-कर्म, पुण्य-कर्म, संस्कार-कर्म, जगदम्बा पूजन के बिना पूर्ण नहीं होता है। धरती से एक मंजिले ऊंचे करीब 16 फीट पर देवी स्थापित हैं। इनका पुजारी एक धानुक परिवार है जिसे ’भगतिया’ कहते हैं। पूजा के चढ़ौवा की आमदनी वही पाता है। यह परिवार श्रीधर ओझा की दासी का परिवार बताया जाता है। मंदिर के विभिन्न ताखों में देवी की ’जोगिनी’ निवास करती है। मंदिर में एक अखंड दीप दिन-रात जलता रहता है जो देवी की ज्योति का प्रतीक है। मंदिर के विभिन्न ताखों में रखे हुए देवी के एक विशेष यंत्र के शास्त्रीय विधि से नित्य पूजा होती है। दिन के बारह बजे से दो बजे तक मंदिर में स्थापित मृतिका पिण्डियों की आभा अपूर्व होती है। ऐसा लगता है कि इसी अवधि में त्रिपुर सुन्दरी की स्थापना हुई होगी।

● जगदम्बा के चरण-कमल के मकरंद के लिए यहाँ के लोग मधुवत आचरण करते हैं। इतना ही नहीं, अनेक ग्राम-पूजा, शत चंडी, सहस्त्र्ा चंडी, अनुष्ठानादि द्वारा भगवती का पजून-तर्पण होता है। दूध, गंगाजल, फूल, इत्र्ा और रोली से इनकी पूजा होती है। मंदिर में कुमारी कन्या को भोजन कराने से समस्त मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। रंगी कागज और खखरी के मुकुटझांप चढ़ाये जाते हैं। सोने चांदी के झांप भी अर्पित होते हैं।

● प्रसन्नता की बात है कि विगत 8 फरवरी 2012 को देवी के मंदिर में आयोजित सहस्त्र चंडी य के अवसर पर लाखों रूपये लगाकर मंदिर के पुननिर्माण का संकल्प लोगों ने लिया था। इस दिशा में यहाँ के लोग कार्यरत हैं। इस पुण्य कार्य में इस क्षेत्र के सभी वर्गों से सहयोग लिया जा रहा है। बड़हिया ग्राम को तीर्थ-धाम बनाने की बात चल रही हैं। बड़हिया ग्राम से सटे ही अशोक धाम में श्री शंकर जी का भी विशाल शिवलिंग धरती से निकला है। दोनों ही स्थान उनकी कीत्र्ति की महागाथा को देश के कोने-कोने में पहुँचाने का भी पुण्य कार्य करें।

● माँ त्रिपुर सुन्दरी के इस लघु इतिहास के संबंध में देश के प्रबुद्ध पाठकों की प्रतिक्रियाएँ सादर आमंत्रित है। ’सर्वेभवन्तु सुखिनः। तथास्तु।

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