बड़हिया किसान आन्दोलन

बड़हिया किसान आन्दोलन का विवरण स्वामी सहजानंद सरस्वती जी के पन्नो से………

सन 1936 से ले कर 1939 तक बिहार में कई महत्त्वपूर्ण लड़ाइयाँ किसानों ने लड़ीं, जिनके करते न सिर्फ वे , प्रत्युत बिहार की किसान-सभा काफी प्रसिध्द हुई। यों तो उनकी छोटी-मोटी सैकड़ों भिड़ंतें जमींदारों और सरकार के साथ हुईं। उनमें बड़हिया , रेवड़ा और मझियावाँ के बकाश्त संघर्ष (सत्याग्रह) ऐतिहासिक हैं। उनसे मेरा (स्वामी सहजानंद सरस्वती जी ) घनिष्ठ संबंध भी रहा है। इसीलिए उनका संक्षिप्त वर्णन जरूरी है।

● इनमें बड़हिया टाल का आंदोलन सबसे पुराना है और बिहार का सर्वप्रथम किसान आन्दोलन है। वह कांग्रेसी मिनिस्ट्री बनने के बहुत पहले सन 1936 ई० के जून में शुरू होकर सन 1939 ई० के मध्य तक चलता रहा। अभी भी आग भीतर-ही-भीतर सुलग रही है। बड़हिया मौजा पटना से पूर्व ई. आई. आर. का स्टेशन तथा मुंगेर जिले का बहुत बड़ा गाँव है।

● उससे दक्षिण-पूर्व-पश्चिम और लाइन से दक्षिण की लाखों बीघा जमीन को बड़हिया टाल सकते हैं। वह सख्त काली मिट्टीवाली है और उसमें सिर्फ रब्बी की फसल होती है। वर्षा के शुरू में ही सारी जमीन पानी से भर जाती है और अक्टूबर में सूखती है। उसे जोतने की जरूरत नहीं। सिर्फ बीज बो देते और फागुन-चैत में तैयार फसल काट लेते हैं। फसल खूब उपजती है। इसीलिए हजारों बीघे की खेती एक-एक जमींदार आसानी से करते हैं।

● टाल में टापुओं की तरह दूर-दूर पर गाँव बसे हैं। उनमें वर्षा में नाव से ही आ-जा सकते हैं। सिर्फ एक हड़ोहर नदी बीच से गुजरती है। उसी का पानी प्राय: सभी पीते हैं। शायद ही किसी-किसी गाँव में कुआँ है। फलत: गंदा पानी पीना ही पड़ता है। मुंगेर जिले में कांग्रेसी डिस्ट्रिक्ट बोर्ड 15 वर्षों से है। मगर गरीबों की खबर कौन ले?

● वहाँ पक्की सड़क का भला पता कहाँ? वहाँ के बाशिंदे अधिकांश धानुक,ढाढ़ी,मल्लाह वगैरह हैं। फिर भी बटाई के नाम पर उन्हें देते थे। फलत:,काश्तकारी कानून के अनुसार उन जमीनों पर उन किसानों का कायमी हक हो गया है। क्योंकि 12 वर्ष से ज्यादा तो सभी ने वे जमीनें जोती हैं।
बिहार के जमींदारों के कब्जे में जो जमीनें हैं वे जिरात (सीर) और बकाश्त (खुदकाश्त) दो ढंग की हैं।सन 1885 ई. से पहले जो जमीनें जमींदारों की खेती में लगातार12 वर्ष रहीं, वही जिरात कहाती हैं। वे तो निश्चित हैं। घट-बढ़ नहीं सकती हैं। मगर जो जमीनें ऐसी न होने पर भी उनके कब्जे में कागजों में लिखी हैं वही बकाश्त हैं। कानून यह है कि लगातार 12 वर्ष जिस बकाश्त जमीन पर कोई रैयत (किसान) खेती करे वह उसकी कायमी (occupancy) हो जाती है।

● वैसा किसान फिर जिस बकाश्त को 1साल भी जोतेगा वह भी उसकी कायमी हो जाएगी। असल में किसान के पास कोई मौरूसी या कायमी जमीन रहने पर ही जो भी जमीन वह जोतेगा वही कायमी होगी। किसी मौजे में जिसके परिवार में 12 वर्ष तक लगातार खेती होती रहे वह ज्योंही बकाश्त जमीन जोतता है त्योंही उसका कायमी हक उस पर हो जाता है।

इसी कानून के अनुसार टाल के किसानों का हक हो गया था। मगर वे इसे जानते न थे। जमींदारों को भी इसकी फिक्र न थी कि वे कभी जमीन पर दावा करेंगे। जमींदारों ने प्राय: किसी के भी पास इसका सबूत रहने न दिया कि वह जमीन जोतता है। रसीद या कागज-पत्र पर कुछ लिख के देते न थे! सारा काम जबानी रहता था! फिर उन्हें फिक्र हो क्यों?वे लोग कांग्रेसी और प्राइम मिनिस्टर के लाड़ले हैं! इसलिए तो’करैला नीम पर ही चढ़ गया’।

● इधर किसान आंदोलन ने जब किसानों में चेतना पैदा की और उन्हें उनका हक समझाया तो उन्होंने उन जमीनों पर दावा किया। उधर जमींदारों ने उनका हक साफ इनकार किया। बस,यही झगड़े की जड़ है। किसान केस तो लड़ सकते न थे। कारण,कागजी सबूत उनके पास न था। फलत: वहाँ के हमारे योध्दा पं. कार्यानंद शर्मा की राय से उन्होंने सत्याग्रह (सीधी भिड़ंत) शुरू किया। ऐसे ही बकाश्त सत्याग्रह बिहार के रेवड़ा आदि गाँवों में हजारों जगह चले हैं। किसानों ने,उनके सेवकों ने मारे खाईं,हड्डिया तोड़वाईं,वे जेल गए,लूटे गए! मगर फिर भी जमीन पर से न तो हटे और न मार-पीट का उत्तर ही दिया।

● सैकड़ों लालवर्दीवाले स्त्री-पुरुष इस संघर्ष का संचालन पं. कार्यानंद शर्मा के नेतृत्व में करते रहे। उनने हँस-हँस के सब कष्ट भोगे,स्वयं कार्यानंद जी को दो बार उसी सिलसिले में जेल जाना पड़ा। दो-दो बार घुड़सवार और हथियारबंद पुलिस का धावा टाल में हुआ। पहली बार सन 1937 के मार्च में सैकड़ों की संख्या में,और दूसरी बार सन 1939 में भी उन्हीं दिनों में। कभी तीन और कभी पाँच खास मजिस्ट्रेट भी लगातार वहाँ रखे गए। यों तो जब फसल बोने का समय अक्टूबर-नवंबर में आया तभी खास पुलिस,मजिस्ट्रेट और सवार भी पहुँचते ही रहे।
शर्मा जी पहली बार सन 1937 ई. में 5वीं फरवरी को पकड़े गए और जून में छोड़े गए। उन पर तथा 19 और साथियों पर120 बी., 117, 107 आदि धाराओं के अनुसार केस चले थे। वे पीछे खत्म हो गए! दो-ढाई सौ किसान भी पकड़े गए। उन पर प्राय: झूठे केस चले। पीछे अधिकांश खारिज हो गए। दूसरी बार शर्मा जी ता. 2-5-39 को गिरफ्तार हुए। उनके साथी भी पकड़े गए।

● टाल के ही संबंध में सन 1936 के अक्टूबर में मुंगेर में, सन 1937 की फरवरी में शेखपुरा में, 1937 के अक्टूबर में लखीसराय में, 1938 के नवंबर में लखीसराय में और 1939 के फरवरी में टाल में ही पाली में किसान सम्मेलन हुए। लखीसरायवाले सम्मेलन में आते हुए सौ किसानों का जत्था श्री पंचानन शर्मा की नायकता में बड़हिया में बुरी तरह पीटा गया! यों तो टाल के सत्याग्रह में बूढ़े स्त्री-पुरुषों की हड्डिया भी टूटीं। मगर वे इतने शांत रहे कि सरकार के अफसरों को लाचार हो के कहना पड़ा कि सचमुच यही शांति सेना है।

दूसरी गिरफ्तारी के बाद ही पं. कार्यानंद शर्मा और श्री अनिल मिश्र ने’किसान-मजदूर बंदी राजबंदी करार दिए जाए’इस माँग के लिए पूरे डेढ़ मास तक जेल में अनशन किया। अंत में कांग्रेसी मंत्रियों ने उन्हें मरणासन्न समझ कर छोड़ा!’किसान बंदी राजबंदी’इस माँग के लिए श्री राहुल सांकृत्यायन को भी दो बार दस और अट्ठारह दिनों तक अनशन करना पड़ा।

● वह हालत खराब होने पर ही जेल से दोनों बार छोड़े गए। इसी सिलसिले में श्री जगन्नाथ प्रसाद और ब्रह्मचारी रामवृक्ष (दोनों ही सारन जिले के हैं) ने पूरे 90 दिनों की भूख हड़ताल जेल में की और मृत्युशय्या पर ही ये लोग भी रिहा हुए। यह सारी घटनाएँ कांग्रेसी मंत्रियों के समय में हुईं! मगर वे टस से मस न हुए! उनने किसान या मजदूर बंदियों को राजबंदी नहीं ही माना !

● पहली बार श्री कार्यानंद जी की गिरफ्तारी के बाद पं. यदुनंदन शर्मा को हमने प्रांतीय किसान-सभा की ओर से टाल में भेजा। वे वहाँ चारों ओर घूमकर देखभाल करते रहे। मुझे तो न जाने कितनी बार टाल में जाना पड़ा है।

● सन् 1937 के जून में श्री राजेंद्र बाबू (डा० राजेंद्र प्रसाद), श्री कृष्ण सिंह आदि की एक कमिटी बनी। उनने कुछ फैसले भी किए,गो किसानों को उनसे ज्यादा लाभ न था। फिर भी हमने उन्हें मान लेने की राय दी। मगर जमींदारों ने ही न माना। पीछे तो उस कमिटी का वह फैसला ही दबा दिया गया।

● फिर सन् 1938 के अक्टूबर में मुंगेर के कलक्टर ने एक दूसरी पंचायत बनाई और फैसले का भार उसे सौंपा। उसने भी काफी गुड़ गोबर किया और बड़ी दिक्कत तथा दूसरी बार शर्मा जी की अध्यक्षता में मुंगेर कचहरी पर ही धरना देने के लिए किसानों के अनेक जत्थे पर जत्थे जाने लगे और शर्मा जी आदि की गिरफ्तारी के बाद ही उसने कुछ किया। मुश्किल से केवल एक हजार बीघे जमीन पर उसने किसानों का अधिकार बताकर उन्हें दिया। अभी उससे कुछ ज्यादा ही जमीन पर किसानों का दावा बना है। कमिटी कुछ न कर सकी। हाँ,इसी बीच बड़हिया टाल से मिले कुसुम्भा टाल में 1800 बीघे जमीन पर जमींदार ने,जो पटने के कोई नवाब साहब हैं,किसानों का हक मान लिया है।

● सन् 1936 के जून में टाल के किसानों ने कलक्टर के पास पहली दरखास्त भेजी। उनके दो जत्थे जाकर कलक्टर से मिले भी। उसी के बाद जमींदारों की नादिरशाही शुरू हुई और इंच-इंच जमीन छीन ली गई! फिर 1937 के बीतते-न-बीतते कमरपुर में किसान खूब पिटे। उलटे 32 के ऊपर 107 का केस भी जमींदारों ने चलाया। बस,सारा गाँव उजड़कर बाल-बच्चे,पशु आदि के साथ रवाना हुआ। साथ में लंबे-लंबे पोस्टरों पर जमींदार का नाम और अत्याचार मोटे अक्षरों में लिखा था !

● कई दिन चलकर वे लोग मुंगेर पहुँचे। रास्ते में ही धूम मची। मुंगेर में जब हर गली में नारे लगाते हुए वे लोग घूमे तो खासी सनसनी फैल गई! अंत में कलक्टर के दबाव से कुछ कांग्रेसी नेताओं की एक तीसरी कमिटी पंचायत करने के लिए बनी। वह तो आज तक खटाई में ही पड़ी है।

● इस प्रकार बड़हिया टाल में जमींदारों के दुराग्रह एवं सरकार तथा मंत्रियों की कमजोरी,बल्कि उनके द्वारा जमींदारों को प्रोत्साहन देने और लीपापोती के कारण ही किसानों के साथ न्याय न हो सका। हालाँकि उनने मर्दानगी से कष्ट भोगे और लड़ाई लड़ी। उनके पथ-दर्शक भी पक्के मिले।

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