श्री जगदम्बा हिन्दी पुस्तकालय : एक परिचय

पुस्तकालय मनुष्य के जीवन के क्षितिज को ज्ञान-रशिमयों से आलोकित करने वाला एक सशक्त माध्यम है। इसलिए पुस्तक की महिमा दौलत से अधिक समझी जाती है। पुस्तक एक ऐसा साबुन है जो मन के मैल को धो डालता है मन का मैल धुल जाने पर व्यकित अज्ञानता के अंधकार से बाहर निकलकर प्रकाश के धरातल पर प्रतिषिठता हो जाता है और वह ‘स्व’ की सीमा को लांघकर समाज व राष्ट का पौरोहित्य करने लगता है। इस सच को महसूसने के बाद हमारे पूर्वजो ने पुस्तकालयों, विधालयों महाविधालयो और सांस्कृतिक पीठों की स्थापना की थी।

● इस सांस्कृतिक चेतना से अनुप्राणित होकर जगदम्बा हिन्दी पुस्तकालय की स्थापना 28 मार्च 1923 ई० में स्व.रामकृष्ण प्रसाद सिंह उर्फ सिंह जी, स्व. राम खेलावन सिंह बच्चू बाबू ने हाहा बंगला के एक खपरैल कोठरी में की थी। यह वह समय था जब हमारा देश पराधीनता की बेडि़यो में आबद्ध होकर प्रताड़ना का दंश झेल रहा था।

● इस पुस्ताकलय के माध्यम से संचालक युवा वर्ग में विधा के प्र्रति अनुराग उत्पन्न् करने के सज्ञथ साथ देश के बर्चस्व और असिमता पर गुलामी के तिरते बादल को विदीर्ण करने की भावना भी रहीं थी। इतना ही नहीं उपयर्ुक्त राष्टभक्त महान भाव विविध विषयों के सदग्रंथो का संग्रह कर पुस्तकालय को समृद्धं करने के साथ ही स्वतंत्रता संग्राम के लिये धन जुटाने के उददेश्य से घर घर जाकर मिटटी की एक मटकी रखकर गृहस्वमियों से उसमें प्रतिदिन एक एक मुटठी अन्न डालने के लिए साद अनुरोध करते थे। इस विधि से एकत्र अन्न को भूमिगत स्वतंत्रता सेनानियो को गुप्त रूप से भेज दिया जाता था जिसे मुठिया कहा जाता था।

● मगर कुछ समय बाद जब गोरी सरकार को इस बात की भनक मिली तब इस अभियान से जुड़े लोगो को नाना प्रकार की यातनाएं झेलनी पड़ीं । समय समय पर पुस्तकालय में ठहर कर संचालकों से गुप्त मंत्रणा किया करते थे।

● कालान्तर में जगदम्बा हिन्दी पुस्तकालय हाहा बंगला से उठकर मील मालिक स्व. चन्द्रशेखर बाबू के मकान में आ गया। गांव के शिक्षा अनुरागियों को पुस्ताकालय के निजी भवन की चिंता बुरी तरह साल रही थी। वे एक ऐसे व्यकित की टोह में लग गये जो पुस्ताकालय के भवन निर्माण हेतु दान स्वरूप जमीन उपलब्ध करा सकें जहां चाह वहां राह की उकित चरितार्थ हुई।

● सरस्वती की कृपा से बड़हियावासी उदारता एंव दानवीर बसुदेव सिंह उर्फ बासो सिंह ने पुस्तकालय के निजी भवन के निर्माणार्थ जमीन उपलब्ध कर जो कीर्तिनीय कार्य किया वह शताबिदयों तक चिरस्मरणीय और प्रेरणीय रहेगा। इन्होने ही पुस्ताकालय की नींव भी डाली थी। किन्तु अर्थाभाव के कारण वर्षो तक भवन का निर्माण नहीं हो सका। बहुत बाद में श्री नारायण सिंह रामचरण आधा ने अपने पिता श्री नान्हा प्रा० सिंह की पुण्य स्मृति में पुस्तकालय के दक्षिण् भाग में एक कमरा का निर्माण कर सराहनीय कार्य किया।

● पुस्ताकलय को जीवांत बनाये रखने के लिए आरंभिक वर्षो में बड़े धूमधाम से वाषिकोत्सव का आयोजन किया जाता था 12.04.1929 ई० को डा० राजेन्द्र प्रसाद ने स्वतंत्र भारत के राष्टपति, पुस्तकालय के वार्षिकोत्सव मे मुख्य अतिथि के रूप में पधारकर लोगो का ज्ञान वर्धन एवं उत्साहवर्धन किया था।

● राजेन्द्र बाबू के अतिरिक्त डा श्री कृृष्ण सिंह, कृष्ण बल्लभ सहाय, रामधारी सिंह दिनकर गोपाल सिंह नेपाली रामदयाल पाण्डेय रामगोपाल रूद्र आदि अक्षर पुरूषो ने अपनी गरिमामयी गरिमामयी उपसिथति से पुस्तकालय के वाषिकोत्सव में प्राण फूंके थे।

● पुस्तकालय अपनी लम्बी संघर्ष यात्रा से गुजरते हुए। वर्तमान में वार्ड न० 1 में राधा मोहन जी ठाकुरवाड़ी के आगे एन०एच 80 पर एक अपने भवन में अवस्थित है। ग्रामीणो से आर्थिक सहयोग लेकर इस पुस्तकालय को आकर्षक बनाने में सर्व श्री रामलखन सिंह, शिवचन्द्र प्र० सिंह, सदानंद प्र० सिंह आदि लगनशाील लोगे की भूमिका उल्लेखनीय है।

● इसके आत्याधिक उन्नययन में श्री मिथिलेश प्रसाद सिंह की जितनी प्रशंसा की जाय कम होगी।पुस्ताकलय के सचिव के रूप में श्री विश्वनाथ सिंह वकील श्री नान्हा प्रसाद सिंह डा० सत्येन्द्र अरूण का योगादन महत्वपूर्ण है। आज पुस्तकालय में उत्साही युवक संजीव कुमार व नलिन कुमार के सहयोग से विविध विषयों का लगभग पांच हजार पुस्तके है। प्रतिमाह 18 पत्र प्रत्रिकाएँ आती है। और रोज पाठकों के लिए पाँच दैनिक अखवार भी आते है। दरअसल यह पुस्तकालय इस क्षेत्र के लिए प्रकाश स्तम्भ है।

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