स्वतंत्रता आन्दोलन में बड़हिया की भूमिका

स्वतंत्रता को अपना जन्मसिद्ध अधिकार मानने वालों की प्रिय स्थली “हा हा बंगला बड़हिया” का स्वतंत्रता आन्दोलन के दौरान महत्वपूर्ण स्थान रहा है, अनेक इतिहासकारों ने हा हा बंगला बड़हिया से संचालित होने वाले आन्दोलन को रेखांकित करते हुए लिखा है की भारत के स्वतंत्रता संग्राम में गाँधी युग (1915) के पूर्व से ही हा हा बंगला स्वतंत्रता संग्राम के सेनानियों हृदयस्थली रहा है।

● मान्यता है की जिस स्वभाव वाले मिटटी की उपज लोग खाते है उनका स्वभाव भी कमोवेश वही होता है. अगर उस दृष्टिकोण से देखा जाय तो बड़हिया टालक्षेत्र के ”काली केवल” मिटटी की से उपजा अन्न खाते है, काली केवल मिटटी के एक टुकड़े को हाथ में लेकर अगर दबाब डाला जाय तो हाथ काटकर खून निकल आयेगा, लेकिन मिटटी का टुकड़ा नहीं टूटेगा। और इसी मिटटी पर अगर अगर एक बूंद पानी डाल दिया जाय तो उसी मिटटी का कड़ापन समाप्त हो जाता है एवं मिटटी से शीतलता बाहर आने लगती है।

ठीक इसी प्रकार के स्वभाव वाले बड़हिया क्षेत्र के लोग होते है, दबाब डालने पर विद्रोह कर देते है और प्यार से पुचकारा जाय तो अपना सर्वस्व न्योछावर कर देते है।

इसी स्वभाव वाले क्षेत्र बड़हिया में में स्थित हा हा बंगला स्वतंत्रता आन्दोलन में गाँधी युग के प्रवेश से पूर्व से ही आंदोलनकारी के रूप में प्रसिद्ध हो चुका था. भारत की राजधानी कलकत्ता हुआ करती थी, कलकत्ता में अविभाजित भारत के सभी क्षेत्रों के क्रांतिवीरों की गुप्त बैठकें हुआ करती थी। 1898 ई० में क्रांतिवीरों ने अंग्रेजी शिक्षा का ज्ञान क्रांतिकारियों में होना आवश्यक समझ कर अपनी कमिटी की बैठक में देश के चिन्हित स्थानों पर हाई इंग्लिश स्कूल खोलने का निर्णय लिया।

निर्णयालोक में बंगाल के क्रन्तिकारी श्यामकुल चटोपाध्याय को क्रांतिकारियों का गढ़ मने जाने वाले बड़हिया में हाई इंग्लिश स्कूल खोलने की जिम्मेवारी सौंपी थी. श्यामकुल चटोपाध्याय रेलवे ठेकेदार के रूप में किउल स्टेशन आये जो रेलवे का महत्वपूर्ण केंद्र था वन्ही से क्रांतिकारियों की प्रिय स्थली हा हा बंगला बड़हिया आये और क्रांति का अलख जगा रहे लोगों की बैठक कर बड़हिया में हाई इंग्लिश स्कूल खोलने का सर्व सम्मत निर्णय लिया। तदुपरांत जन सहयोग के बल पर हा हा बंगला से संचालित अभियान के तहत 1912 के प्रारंभ तक दो विशाल छात्रावास एक बड़ा एवं दो छोटा खेल मैदान लगभग पाँच एकड़ से बड़े जमीन के एक चौकोड़ टुकड़े पर एक चार दिवारी के अन्दर बनकर तैयार हो गया और अंग्रेजी हुकूमत ने इसे 1912 ई० में संचालित होने की अनुमति दे दिया।

● क्रांति के अमर सपूत चंद्रशेखर आजाद, भगत सिंह, राजगुरु सरीखे, क्रांतिवीरों के अभिमत सहयोगी योगेन्द्र शुक्ल आदि क्रांतिकारियों की टोली लेकर हा हा बंगला बड़हिया में प्रवास कर क्रांति का अलख जगाते थे यंहा महात्मा गाँधी और देशरत्न डॉ० राजेन्द्रप्रसाद भी आ चुके है. उसी वक्त खेल के माध्यम से लोगों ने एकत्रित कर क्रांतिवीरों नें स्वतंत्रता आन्दोलन का सन्देश देने का भी कार्य प्रारंभ किया था। जिसके तहत बड़हिया में नेशनल स्पोर्टिंग क्लब की स्थापना कर पंजाब, बंगाल, महाराष्ट, लाहौर, सहित भारत के विभिन्न भागों से स्वतंत्रता संग्राम के क्रांतिवीर फुटवाल खिलाड़ी के रूप में हा-हा बंगला आते थे और फुटबाल टूर्नामेंट में खेल दिखा कर स्वतंत्रता संग्राम का संदेश आम लोगो तक देते थे फुटबाल के लिए स्थानीय संपन्न लोगों ने लगभग 10 एकड़ जमीन का एक टुकड़ा दान दिया था जो आज बड़का फिल्ड नाम से N.H 80 के किनारे पाया जाता है और श्री जगदम्बा नेशनल स्पोटिंग क्लब के बैनर तले फुटबाल टूर्नामेंट आयोजित कराता आ रहा है।

● 52 ठाकुरबाड़ियों वाला वाले बड़हिया में मर्मक्ष हुआ करते थे जिसमे बाबु राम सरोवर शरण जी, रामनाथ बाबु, रामनंदन सिंह, सरयुग सिंह, आदि प्रमुख थे, वर्ष में तीन मास कथा होता था. कामिल बुल्के रामायण की गहराई के लिए बड़हिया आया करते थे,. बड़हिया स्थित हा हा बंगला पठन पाठन का केंद्र रहा. वर्ष 1921 में हा हा बंगला में राष्ट्रीय विधालय की स्थापना हुई थी. 28 मार्च 1923 को को हा हा बंगला में श्री जगदम्बा हिंदी पुस्तकालय की स्थापना क्रांतिवीरों ने किया था।

कालांतर में श्री जगदम्बा हिंदी पुस्तकालय वर्त्तमान में N.H 80 के किनारे अपने भवन में स्थानांतरित है. हा हा बंगला बड़हिया में 19 अक्टूबर 1923 को छात्र परिषद् की स्थापना हुई थी. 1923 में नागपुर सत्याग्रह के लिए बिहार से जाने वाले में प्रमुख जत्था में बड़हिया के लोग शामिल हुए थे।

कुटीर उद्योग के द्वारा गाँव में सम्रिद्दी लाने के उद्देश से स्वतंत्रता आन्दोलन के संचालकों द्वारा संचालित ”लाजपत चरखा संघ” की स्थापना हा हा बंगला बड़हिया में हुई थी. 12 अप्रैल 1929 को डॉ० राजेंद्र प्रसाद ने हा हा बंगला बड़हिया से संचालित विदेशी वस्त्र और मादक द्रव्य का बहिष्कार आन्दोलन का नेत्रित्व किया था. 22 अप्रैल 1929 को हा हा बंगला बड़हिया में क्रांतिवीरों की की सभा में बड़हिया थाना कांग्रेस स्वतन्त्र स्थापना हुई थी. 1936 में राष्ट्रीय स्तर पर संचालित किसान आन्दोलन का मुख्य केंद्र भी हा हा बंगला बड़हिया रहा।

● 1938 में राष्ट्रीय स्तर पर संचालित किसान आंदोलन चरम दर आया तो किसान नेता स्वामी सहजानंद सरस्वती कार्यानंद शर्मा विद्वान राहुल संस्कृत्यायन गंगाशरण सिंह , जय प्रकाश नारायण, डां राम मनोहर लोहिया, किशोरी प्रसन्न सिंह सरीखे अग्रणी नेता हा-हा बंगला में प्रवास कर आंदोलन को गति देने का काम किया था। स्वामी सहजानंद सरस्वती ने लम्बा प्रवास किया था।

लोकमान्य गंगाधर तिलक और सुरेन्द्रनाथ बनर्जी के व्याख्यान तथा श्री अरविन्द के विचारों से प्रभावित होकर अपनी वकालत छोरकर सक्रिय राजनीति के साथ सवतंत्रता आन्दोलन में प्रथम चरण हिन्षक क्रांति में शामिल होने के बाद गाँधीवादी से प्रभावित होकर अहिंसक आन्दोलन के अगुआ बने बिहार के प्रथम मुख्यमंत्री डां० श्री कृष्ण सिंह ने भी बड़हिया को ही अपनी भूमि बनायी थी।

● अछूत उद्वारक की भूमिका में महात्मा गांधी जब आस्था का केंद्र वैधनाथ धाम के पवित्र मंदिर में हरिजन प्रवेश कराने का कार्यक्रम तय किया था तो देवघर के पुजारी पंडा सहित छुआछुत को मानने वाले दबंगो ने इसके मुखर विरोध करने की घोषणा की थी।

● महात्मा गांधी ने डॉ० श्री कृष्ण सिंह के द्वारा वैधनाथ धाम मंदिर में हरिजन प्रवेश वाले कार्यकम को सफल बनाने में बड़हिया के लोगे से मदद मांगी बड़हिया के लोग बड़ी संख्या मे जाकर अंहिसक आंदोलन के पुरोधा महात्मा गांधी को जसीडीह स्टेशन से वैधनाथ धाम मंदिर तक सुरक्षित प्रवेश दिलाने में अहम भुमिका निभाई।

प्रत्यक्ष दर्शियों की माने तो अगर बड़हिया के लोग अपनी जान की बाजी लगाकर महात्मा गांधी को नही बचाते तो उसी दिन महात्मा गांधी की हत्या हो गयी होती, मगर बड़हिया के क्रांतिवीरों ने मानव श्रिंखला बनाकर अपने शरीर पर लाठी-भाला का प्रहार सहते हुऐ उसके बीच से महात्मा गांधी को जसीडीह से देवघर मंदिर में प्रवेश करा दिया । एक जगह महात्मा गांधी के बुरी तरह घिर जाने के बाद बड़हिया के कामता पहलवान इन्हे गोद में लेकर मीलों भागे और आक्रमणकारियों की पहुंच से महात्मा गांधी को दूर ले गये।

राजनीतिक टीकाकरों की माने तो महात्मा गांधी ने बड़हिया वासियो के त्याग और बलिदान को महसूस किया और बड़हिया को अपनी कर्म भूमि बताने वाले द्र० श्री कृष्ण सिंह को भारतीय राजनीति की क्षितिज तक साथ लेकर चले और उचित स्थान दिलाने का काम किया। इतिहाकारों की खोजिस्ता माने तो बड़हिया शुरू से ही अन्याय के खिलाफ और स्वतंत्रता का पक्षधर रहा है।

● 1770 से पूर्व दिल्ली पर कमजोर मुस्लिम शासक के ज़माने में कई लुटेरे योद्धा दिल्ली दरबार का आशीर्वाद प्राप्त कर आम जानो को लूटता मारता था. अपनी विशाल सेना के साथ गया जिले के मशहूर और पराक्रमी राजा और सेनापति कामगार खां और नामगार खां बड़हिया लूट-खसोट करने आये थे और हरुहर नदी के पशिचम तट पर उनने डेरा डाला।

तब बड़हिया के वीरों ने छप्पन हाथ का अलोकिक पगड़ी बांधने वाले योद्धा फ़तेह सिंह के नेतृत्व में माँ बाला त्रिपुर सुंदरी मंदिर से आशीर्वाद स्वरुप प्राप्त प्राप्त तलवार लेकर कामदार खान की सेना से लड़ने चल जाते है. श्री फतेह चौधरी वंशावली के अनुसार बाबा इंद के पांचवे पीढ़ी में आते है युद्ध के दौरान कामगार खां का भार्इ नामगार खां युद्ध के लिए इन्हे ललकारता है तब इन्होने एक शर्त रखा की युद्ध में मारा जाता हूं तो मेरे गांव का लोग तुम्हारा धर्म मान लेंगे और अगर तुम युद्ध में मारे जाते हो तो मेरा धर्म स्वीकार लेना या इस क्षेत्र को छोरकर जाना होगा दोंनो शर्त केा मानकर युद्ध के लिए तैयार हो जाते है।

अपने धर्म के अनुसार पहला मौका नामदार खां को दिया जिसके वार से श्री फतेह चौधरी की पगड़ी कट जाती है तथा फतेह वार से श्री फतेह चौधरी की पगड़ी कट जाती है तथा फतेह चौधरी के वार से नामदार खां का सर खणिडत हो मृत्यु को प्राप्त कर जाता है। यह देख उसका भाई कामदार खां अपने सैनिक के साथ वापस चला जाता है।

● इतिहासकारों की खोजी दस्ता का मानना है की अन्याय के खिलाफ लोहा लेने की क्षमता रखने वाले कौम को ही 1770 ई०के आस पास अंग्रेज हुक्मनरान लार्ड कर्नालविस जब जमीं का स्थाई बंदोबस्त करना शुरू किया था तो जमींदारी इसे ही सौंप दी थी. जब अंग्रेजो का जुल्म कहर बरपाने लगा तो यही कौम विद्रोह पर उतर गया।

हा हा बंगला से संचालित स्वतंत्रता संग्राम की मुहीम पर अंकुश लगाने के लिए अंग्रेजों ने teen सैनिक केंद्र बड़हिया में स्थापित किये थे जिसे आज भी पुराणी छावनी, नयी छावनी और पलटन पड़ाव के नाम से जाना जाता है. हा हा बंगला पर क्रांति का लिया गया निर्णय तिलक मैदान बड़हिया में क्रांतिवीरों को तिलक लगाने से शुरू होता था। आजाद भारत के लोगों द्वारा क्रन्तिस्थल हा हा बंगला को भुला दिए जाने से वह अपने अस्तित्व रक्षा के लिए मुहताज बना हुआ है।

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