बड़हिया का पौराणिक इतिहास

 

● बड़हिया के मूल निवासी जाति के भूमिहार-ब्राह्राण मूल दिघवे और गोत्र के शांडिल्य है।

● उनका मूल स्थान दिघवागढ़ , थाना मसरख जिला सारण है उक्त स्थान पर इनके राजभवन जलाशय इत्यादि के अवशेष अभी भी वर्तमान है।

● पूर्व में ये मैथिल-ब्राह्राण थे और इनकी पद्धति ठाकुर की थी, ये पुरोहित और पंडिताई कर्म की वृति वाले थे, कालान्तर में ये लोग संदहपुर नामक ग्राम थाना रोसडा जिला समस्तीपुर में आकर बस गये।

● शाक्तों के इतिहास में वह गौरवशाली दिवस था जब इसी गाँव के दो शाक्त बंधु श्री पृथु ठाकुर तथा श्री जय-जय ठाकुर देवघर को जाते हुए गंगापार कर बड़हिया ग्राम में रात्रि विश्राम के लिए यहाँ ठहरे ये सहोदर भ्राता धर्मनिष्ठ, शास्त्रज्ञ, और त्रिकालदर्शी थे। तंत्र-शास्त्र के ये प्रकांड पंडित थे। अपने अतिन्द्रिय बोध द्वारा सुगमतापूर्वक इन्हे भूत, भविष्य, वर्तमान तीनो कालो का समपूर्ण ज्ञान प्राप्त हो जाता था। बड़हिया में वर्तमान जगदम्बा स्थान (माँ बाला त्रिपुर सुंदरी का मंदिर) जिस स्थान डीह पर है वहाँ इनलोगे ने एक अलौकिक चमत्कार देखा। वहाँ इन्होंने मूषक (चूहे) से बिल्ली को पराजित होते देखा। नि:संदेह यह पावन और अलौकिक भूमि है, जहाँ दुर्बल भी सबल हो जाते है। वे शाक्त तो थे ही सिद्ध साधक भी रहे होंगें, उन्हें यह परख हो गई, कि इसी स्थान पर अनादि स्वरूपा बाला त्रिपुर सुंदरी माँ जगदम्बा का प्रादुर्भाव होगा। भागवत में एक वचन आया है कि गंगा तट पर भगवती का एक सिद्ध पीठ है जो मंगला पीठ कहा जाता है संभव है की वह सिद्ध पीठ यही स्थान है। जानकारों की माने तो पूरे भारतवर्ष में गंगा के किनारे इस पीठ के सिवा कोई मंगलापीठ नहीं है, देश के पंडितो विद्वानों और श्रदालु भक्तो का ध्यान इस अनुसंधान की ओर जाना चाहिए।

● कुछ महीनों के बाद उक्त दोंनो शाक्त बंधु वापसी यात्रा में यहाँ ठहरकर उक्त तेजस्वी डीह की प्राप्ति का मार्ग ढूँढने लगे, उस समय इस भू भाग पर पालवंश “(आठवी से बारहवीं शताब्दी का राज्य) के राजा इन्द्रदुम्मन का राज था। सोलह राज्य अन्यथा जो जनपद कहे जाते थे उसमें अंग भी एक जनपद था। आठवीं शताब्दी में गोपाल ने ही इस पालवंश की नींव डाली और बंगाल का शासक बनकर उन्होंने बिहार का भी अधिकृत कर लिया। इस तरह अंग जो मगध में सम्मलित हो गया था। पालवंशी राजाओं के अधीन हुआ इस बंश में देवपाल नारायण पाल ने नालान्दा के मंदिरो का जीर्णोद्धार कर प्रतिमायें स्थापित की कई राजाओं के बाद इस वंश का शक्तिशाली राजा महीपाल हुऐ। जिसने बनारस तक अपनी राज्य सीमा का विस्तार किया अन्त में यशस्वी राजा रामपाल के बाद के राजा की शक्ति हीन होता गया, और आगे चलकर इस वंश का राजा इन्द्रयुम्न हुआ, जिसने अपना किला जयनगर में बनाया। अब यह जयनगर एक छोटा गाँव है। और लखीसराय के पास है’’ दोनो शाक्त बंधु भूमि प्राप्ती के मार्ग हेतु राजा से मिलने गये जब दोनो बंधु रास्ते से गुजर रहे थे। तो अपनी बदली हुई धोती तथा गीली धोती को अपने तंत्र शक्ति से अपने सर के उपर चन्दोवा के रूप में साथ-साथ ले चल रहे थे। इस अलौकिक दृश्य को नगरवासी देखकर विस्मत हुए और राजा को सारी बात बतायी। राजा इन्द्रदुम्न का एकमात्र पुत्र कुष्ठ रोग से ग्रसित था, इससे राजा दुखित और चिन्तित रहता था। तो राजा ने दोनो भाइयों को सादर महल में बुलवाकर सारी व्यथा सुनाये राजा ने इनसे पुत्र की जिन्दगी की भीख मांगी। इस आग्रह को स्वीकार कर दोंनो शाक्त बंधुओं ने अपनी तंत्र शक्ति से राजपुत्र को रोगमुक्त कर पुरस्कार स्वरूप इस भू-भाग पर बढई जाति के लोग रह रहे थे। इसलिए यह भू-भाग बड़ही नाम से जाना जाता था। कालान्तर में यह बड़हिया नाम से प्रसिद्ध हुआ। उस समय बड़हिया का यह भू-भाग तथा आसपास की भूमी इसी राज्य पालवंशी राजा इन्द्रदुम्न के राज्य में थी यह पालवंश का अंतिम राजा था क्योंकि 1197 ई० में बखियतार खिलजी ने मुगेंर फतेह किया और इन्हें हरा कर इस क्षेत्र प्रदेश को मुसलमानी साम्राज्य में मिला लिया।

● पहले इनलोगों ने गृह निर्माण इस डीह पर किया तदुपरांत परिवार को लाकर बसाया। श्री श्री जय-जय ठाकुर कर्मकाण्ड के प्रकाण्ड विद्वान थे उनकी ख्याति इतनी फैल चुकी थी, कि कर्म विशेष पर के अवसर पर आचार्यत्व के लिए इनकी बुलाहट होने लगी। उन्होने देखा की भरण पोषण के लिए यहाँ पाण्डित्य से भी यथेष्ठ लाभ है, इसलिए उन्होंने इस वृति को अपनाया और अपनी हिस्से की सारी भूमि भाई के नाम चढ़ा दी, और भाई पृथु ठाकुर पूर्ण रूपेण भूमिहार होकर किसान बन गए। फलतः जय जय ठाकुर और पृशु ठाकुर के बंशज यहाँ क्रमश: मैथिल ब्राह्राण और भूमिहार ब्राह्राण के नाम से पुकारे जाने लगे। श्री श्री जय जय ठाकुर ने पुजा पाठ मे अपने सगे भाई से दान लेना उचित नहीं समझा। अत: उन्होंने इस कर्म हेतु अपने जलेबार ब्राह्राण भांजे को यहाँ लाकर बसाया पुरोहित कर्म पुरोहित कराने लगे परन्तु लित कुश ओर दान दक्षिणा लेने का कार्य जलेबार करने लगे अभी तक यही चल रहा है।
श्री पृशु ठाकुर के वंशजो में श्री प्राण ठाकुर उल्लेखनीय है इनके समय में एक ऐतिहासिक घटना का होना बतलाया जाता है।
● निकट ही पाँच छ: कि०मी० दूर गाँव मरांची है। किसी अपराध वस मरांची के भूमिहारों का बहिष्कार जाति वालो ने कर दिया था। इसका असर आस-पास के गाँव पर भी पड़ा, जिससे मरांची गाँव से सभी गाँव अपना अपना रिस्ता-नाता तोड़ लिया, जिस कारण उनके परिवार की लड़कियाँ बड़ी उम्र तक अविवाहित रहने लगी, उस समय समाज के कठोर दृढ अनुशासन के कारण इस प्रकार के जाति बहिष्कार का पालन बड़ी कठोरता से किया जाता था। 1438 ई० में बंगाल से आगरा तक का शासक हुमायूँ था। उस समय आगरा से विद्रोह की खबर सुनकर सेना सहित कुच कर गया। सेना दो रास्ते से चली एक रास्ता ग्रेड टेंक रोड से शासक के साथ चला और दूसरा सेनापति के साथ इस रास्ते से आया जो मरांची में पड़ाव डाला।
● सेनापति के सांयकालीन भ्रमण में उस गाँव मरांची के अति वयस्क लड़कियों को देख् अचंभित रह गयें। इस पर गाँव के लोगों से जब बात हुई, तो सेनापति ने सहानुभूति प्रकट की और सहायता को तत्पर हुए। मरांची के बहिष्कृत समाज ने यह आवेदन किेया और स्पष्ट कहा की अगर बड़हिया के बाबू लोग विवाह संबंध कर लें तो अन्याय का भय नही रहेगा और उनका बहिष्कार संकंट दूर हो जाएगा।
सेनापति ने वचन दिया की मरांची का विवाह संबंध बड़हिया में अवश्य कराएगें। उन्होंने अधिकार एवं बल दोंनो से उनकी सहायता की और इनने बड़हिया के लोगो से अनुनय अनुरोध किया कि बहिष्कार हटा कर संबंध स्वीकार करें। परन्तु सामाजिक अनुशासन या हठ पर आरूढ होकर संबंध सुझाव अस्वीकार कर दिया गया। अब परामर्श ने हुकुम का रूप ले लिया और प्रभुता एवं बल का प्रयोग किया जाने लगा पर बड़हिया वाले भी जिद पर अड़ रहे। जन्मभूमि, सम्पति, संबंधी छोड़कर बहिष्कृत गाँव की लड़की से विवाह ना किया और बड़हिया गाँव को छोड़कर कही अन्यत्र बस गये। समीप के औंटा लखनचन, इन्दुपुर, वीरूपुर, बंरूआणे, वारो पोखरिया, दरवे बीहट एवं दूर-दूर के अनेक गाँव जाकर वे बस गये और उनके वंशज भी अपने पुराने स्थान बड़हिया को याद कर इस कहानी की पुष्टि अब तक कर रहे है। कहा जाता है इस भगदड़ मे समूचा गाँव ही खाली हो गया। सैनिक जब बड़हिया गाँव प्रवेश किया तो कोई नही मिला केवल एक मात्र व्यकित रह गये श्री प्राण ठाकुर वह पैर से लाचार थे, इसलिए समय पर गाँव से जा नहीं सके।

● अत: अपनी वचन वद्धता के कारण श्री प्राण ठाकुर को मरांची ले जाकर वहां के लड़की से शादी करवा दी इस प्रकार इस मरांची कांड से मरांची गाँव का जाति बहिष्कार समात्त हुआ। इस विवाह संबंध के बाद श्री प्राण ठाकुर को पश्चिम पाली और दक्षिण ताजपुर बोधनगर एवं उत्तर कोनी तक की जमीन चल अचल सम्पति भेट स्वरूप मिल गई। जो अब बड़हिया टाल के नाम से विख्यात है, इसी विवाह के फलस्वरूप श्री प्राण ठाकुर का वंश आगे चलकर वृहद रूप में बड़हिया का निर्माण किया जो आज का यह रूप है।
इनके वंश में अलग-अलग पीढी में बारह महापुरूष हुए जिनके नाम पर यह बड़हिया का बारह टोला है।

● इसी मरांची कांड की घटना के चक्र में कुछ भाई ने बाहर जाकर इन्दूपूर गाँव बसाया, कुछ समय के बाद इसने बड़हिया वालों से कुछ खेत की माँग कि तब बड़हिया वालों नें उदारतावश और कौतुक प्रेम से उन्हें यह आदेश दिया गया, कि सूर्योदय से सूर्यास्त तक इन्दूपूर वाले जितनी भूमि पर टहल आवें वह उन्हें दे दी जाएगी। और वचन का पालन भी हुआ यधपि जमीन उन्हे कम ही मिली मगर इस तरह बड़हिया इलाके की वह सर्वोत्तम एवं सर्वाधिक कीमती जमीन उन्हें मिल गयी। वीरूपुर बसाने वाले भाइयों को कुछ जमीन नहीं मिली। यहाँ के तीन भूमिहार और संतोष नामक ब्राह्राण ने भूल से रात में गधा मार कर पका कर खा लिया था। इस अपराध से वे अभी तक बड़हिया द्वारा बहिष्कृत है इनके पुरोहितो ने इनके प्रायशिचत में एक मंत्र की रचना की जो अभी तक प्रचलित है।

”तीन बाभन एक संतोषं। गधा खैले न ही कुछ दोष”

■ ऐसा संदेह किया जाता है की इन्दुपुर के प्रति जो उदारता गई उसी की पुर्नावृति के भय से यह बहाना लगाकर वीरूपुर वाले को भूमि से वंचित किया गया।

● स्थानीय किबदन्ती के अनुसार एक बार अपनी विशाल सेना के साथ गया जिले के मशहूर और पराक्रमी राजा और सेनापति कामगार खाँ और नामगार खाँ बड़हिया लूट-खसोट करने आये थे और हरुहर नदी के पशिचम तट पर उन्होंने डेरा डाला। कहा जाता है बड़हिया के फतेह सिंह को माँ जगदम्बा की अनुकम्पा से स्वप्न में मुस्लिम अक्रांताओ के कुविचारों का आभास हुआ। प्रात काल वे देवी के मंदिर में अपनी तलवार रखकर ध्यन मग्न थे की तलवार उठकर उनके हाथ में आ गयी। इस धटना को देवी का आशीर्वाद मानकर वे गाँव वालों के साथ युद्ध लड़ने चल दिए। श्री फतेह चौधरी वंशावली के अनुसार बाबा इंद के पाँचवें पीढ़ी में आते है। युद्ध के दौरान कामगार खाँ का भाई नामगार खाँ युद्ध के लिए इन्हें ललकारता है। तब इन्होंने एक शर्त रखा की युद्ध में मारा जाता हूँ। तो मेरे गाँव का लोग तुम्हारा धर्म मान लेंगे और अगर तुम युद्ध में मारे जाते हो, तो मेरा धर्म स्वीकार लेना या इस क्षेत्र को छोड़कर जाना होगा। दोंनो शर्त को मानकर युद्ध के लिए तैयार हो जाते है। अपने धर्म के अनुसार पहला मौका नामदार खाँ को दिया, जिसके वार से श्री फतेह चौधरी की पगड़ी कट जाती है, तथा फतेह वार से श्री फतेह चौधरी की पगड़ी कट जाती है तथा फतेह चौधरी के वार से नामदार खाँ का सर खणिडत हो मृत्यु को प्राप्त कर जाता है। यह देख उसका भाई कामदार खाँ अपने सैनिक के साथ वापस चला जाता है। तथा श्री फतेह चौधरी माँ को प्रणाम कर बड़हिया लौट जाते है यह कोई गप नही एक सच है क्योंकि इस घटना का उल्लेख मुंगेर जिला के गजेटियर में आया है।

● गया जिला के गजेटियर में कामगार खाँ का उल्लेख इस प्रकार है।

● सिरीश और कुटुबा के विष्णु सिंह राज कर देने से इनकार कर रहे थे तो बिहार के नायक सूबेदार राजा रामनारायण ने उन पर आक्रमण किया, यह घटना सन 1761 ई० में राजा सिराजुधौला की मत्यु के बाद हुई। कुछ समय बाद साम्राज्य कमजोड़ पड़ते ही बंगाल के सूबेदार ने गया जिला पर प्रभुता कायम कर ली, फिर राजा शाह आलम ने कामगार खाँ की सहायता से गया पर कब्जा कर सम्राट की उपधि प्राप्त की तथा एक हजार मुगल घोड़ों की सहायता से कामगार खाँ ने टिकारी राजा को किले से वार निकालकर बंदी बना लिया।

● फल्गू नदी के दाहिने किनारे पर मानपुर में 25 जनवरी 1761 के दिन शाह आलम का युद्ध अंग्रेजी सेना से हुआ। इसके सेनापति थे, मिर्जाफर के पुत्र मीरन और मेजर कर्नाक। राजा रमनारायण भी अंग्रोजी के साथ हो गयें और बाढ़ के पास राजा शाह आलम और अपने साथ्ज्ञी कामगार खाँ के साथ परास्त हुए। होकर भाग निकले।

”उसका विवरण गया जिले के गजेटियर में है।
● समय के अंतराल में जय जय ठाकुर की और पृथु ठाकुर की कौशल और पराक्रम की चर्चा आसपास के गाँवो में होने लगी। तथा इनके संस्कार से प्रभावित होकर इनकी पूजा एवं मर्यादा का सम्मान करने लगे। वे महापुरूष ग्राम देवी माँ काली को गाँव के पशिचम में माँ काली के अर्ध पिण्ड के रूप में स्थापित किये। माँ के बगल में छः मृतिका पिण्ड है इनमें तीन योगनी एक पिण्ड गरभू के नाम से जाना जाता है। तथा दोनों शाक्त भ्राता योगनी के बगल में पिण्ड के रूप में स्थापित किये गये है।

● श्री जय जय ठाकुर के वंश में एक शाक्त महापुरूष का जन्म हुआ। बाबा श्रीधर ठाकुर जो आगे चलकर श्रीधर ओझा के नाम से विख्यात हुए। वंश परम्पर के अनुसार वे साधक एवं तांत्रिक थे। इनके बारे में कहा जाता है, ये सिद्ध तांत्रिक व अशमशानी थे। ये घर परिवार से दूर गंगा तट पर कुटिया में रहकर पूजा में तत्लीन रहा करते थे और देवी के अनेक सिद्धियों को प्राप्त कर चुके थे। इन्होंने ही स्थानीय जगदम्बा मंदिर (महारानी स्थान) की स्थापना की जो इस वंश की और बड़हिया ग्राम की सर्वमान्य ईर्ष्ट देवी है। यह देवी उपासना भी इनके और हमारे पूर्वज का मैथिल होने की पुष्टि करता है। माता के आर्शीवाद से बाबा श्रीधर को जगदम्बा इत्यादि सात बहने गंगा की धारा बिहार करते दर्शन हुए और भक्त श्रीधर के प्रार्थना पर यहाँ रूक गई। और उनके द्वारा मंदिर में मृतिका के पिण्ड स्थापित किये गए। जिनमें देवियाँ अधिष्ठित है बाद में भक्तो ने उनकी स्मृति में उक्त चार पिण्डो के उतर भाग में एक मृतिका पिण्ड की स्थापना कर दी । वही माँ बाला त्रिपुर सुंदरी अपनी अलौकिक शक्तियों के साथ बड़हिया ग्राम के पूर्वी छोड़ पर एक भव्य मंदिर में विराजती है, और ऐसा कहा जाता है कि जो श्रद्धालु भक्तगण जम्मू कश्मीर जाकर माँ वैष्णो की दर्शन नहीं कर सकते उन्हें बड़हिया में माँ बाला त्रिपुर सुंदरी के दर्शन पूजा उपरांत पूर्ण फल की प्राप्ति होती है।

● कहा जाता है की श्रीधर ओझा ने आस पास के अन्य स्थानों में भी महाविधाओं के प्रतीकों एवं विग्रहो की स्थापना की।

● उनमें हरूहर नदी के तट पर बड़हिया ग्राम क्षेत्र में अवस्थित पाली ग्राम में परमेश्वरी की स्थापना की गई। जिसे परमेश्वरी स्थान के नाम से जाना जाता है।

● एक दस्तावेज से पता चलता है कि प्राण ठाकुर के वंशजो में में सम्पति का बँटवारा हुआ। 1612 ई० में एक कबूलियत के जरिये बाबा इन्द जो प्राण ठाकुर के पाँचवे पीढी में आते थे। उन्होंन काह- चराय मौजा बड़हि- पाली का बन्दोवस्त लिया था। बँटवारे में कुल बारह मालिक कायम हुए अत: बारह पटिदार का नाम निम्न है :-

1.चौधरी जीवन ठाकुर

2. चौधरी गोपीनाथ ठाकुर

3. चौधरी शिव ठाकुर

4. चौधरी इन्द ठाकुर

5. चौधरी गौड़ ठाकुर

6. चौधरी श्याम ठाकुर

7. चौधरी प्रयाग ठाकुर

8. चौधरी दुखहरण ठाकुर

9. चौधरी रामचरण ठाकुर

10. चौधरी धनराज ठाकुर

11. चौधरी रामसेन ठाकुर

12. चौधरी दानी ठाकुर

13. चौधरी श्री कंठ ठाकुर

इन सभी पूर्वजों में बाबा जीवन चौधरी की कोई संतान नही था। इनके बारे में किम्वदंती प्रचलित है, कि चौधरी जीवन ठाकुर शारिरिक शक्ति से अति बलिष्ठ थे, किसी भी कार्य को अपने शक्ति से करने की क्षमता थी। इनके पटिदारों ने शक्ति के कारण हत्या का षडयंत्र रच कर तीषी के खाध तीसी से निकलने की बहुत कोशिश से की पर जितना प्रयास किए उतना तीसी के अंदर धसते चले गए अंत में अपने की असहाय समझ पटिदारों को शाप दिया की जो मेरा हिस्सा लेगा तथा उसपर वाश करेगा वह मेरे तरह वंशहीन रहेगा। और इस तरह उनका शाप दिधवे वंशीय आज भी मान रहे है।

● इस तरह बड़हिया कुल बारह टोलो का नगर है हमसब टोला कहने से पहले बाबा कहते है, क्योंकि बारह टोली का नाम हमसबों के पूर्वजो का ही नाम है। इस तरह बाबा जीवन की निसंतान मृत्यु के कारण टोला के रूप में चौधरी श्रीकंठ की गिनती होती है।

● बाबा श्री कंठ चौधरी के संबंध में एक किबदन्ती है कहा जाता है अनुमानत: बाबा जीवन ठाकुर के दु:खद घटना के पूर्व ही स्वयं श्री कंठ चौधरी या उनके कोई पूर्वज नाव का डोरी खीचते हुए गंगा के रास्ते से बड़हिया आये बड़ी गरीब हालत में और ऐसा कहकर परिचय दिया की वे भी बड़हिया के ही निवासी के वंशज है। मरांची कांड में उनके पूर्वज भाग गये थे तथा गाँव वालो से अपने को निर्धन निसहाय तथा सजातीय का दुखरा सुनाया और निवास करने की इच्छा व्यक्त की तब उन्हें यहाँ रख लिया गया। लेकिन वर्तमान में इनके वंशज इस कथन को सच नहीं मानते है और अपने को प्राण ठाकुर का ही वंशज बताते है परंतु इनके वंशज सभी एकत्र गाँव के बाहर उत्तर छोड़ पर बसे हुए है, इनके खेत भी प्राय: सब बड़हिया टाले के उत्तर छोड़ पर कोनी टाल में स्थित है।

● पूर्व साक्ष्यों प्रमाण से पता चलता है कि बाबा श्री कंठ चौधरी बंशावली में कही भी नहीं आते है।

● पूर्व में रामचरण चौधरी वे वंश में एक मसोमात के मृत्यु उपरांत उनकी सम्पति को लेकर दो पक्षो में दिवानी केश हुआ। सम्पति 1600 बीघा की थी। इसमें दोंनो पक्षो के बाद जहाँ प्राण ठाकुर की वंशावली प्रस्तुत की गई। तब 13.08.1948 ई० के जजमेंट पेज नं० 14 में श्री कंठ चौधरी को साक्ष्य के आधार पर प्राण ठाकुर के वंश में नही माना गया तथा प्राण ठाकुर का नजदीक गोतिया माना गया है।

● जय जय ठाकुर के वंश का पता नहीं चलता है जिस समय मरांची कांड हुआ वे बड़हिया में रहे या गाँव छोड़कर चले गये, उस समय गाँव से गये या नही कोई विस्तार नहीं हो पाया। साथ ही इनकी वंशावली भी उपलब्ध नही है, कर्मकाण्ड तथा पुरोहित कार्य वास्ते ये लो अपने मान्सा को लाकर बसाये जो जलेबार बहा्रण कहलाये। श्राद्ध कम में कुष देने वास्ते मिश्र जाति के बाह्रण को बसाया गया। वर्तमान में जलेबार बाहणीय परिवार श्रीधर बाबा को जलेबार ब्राह्राण कहकर अपना पूर्वज बताते है पर यदि बाबा श्रीधर जलेबार बाह्रण होते तो माँ जगदम्बा का वरदान जलेबार बह्राण को मिलना चाहिए थाना की दिधवे वंशीय को।

● बड़हिया लक्ष्मी, सरस्वती, दुर्गा और काली के वरद पुत्रो की नगरी है। चूँकि बड़हिया तपस्वियों द्वारा बसाया गया धर्मरूढ ग्राम है। धर्मस्थल है इसलिए बड़हिया की संस्कृति और उसकी विरासत पर हमें गर्व है।  जय माँ जगदम्बा 🙏

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

error: Content is protected !!