बड़हिया का परिचय

बिहार के लखीसराय जिला स्थित “बड़हिया” हावड़ा-दिल्ली रेलखंड के मुख्य मार्ग पर बसा हुआ है। यहाँ रेलवे स्टेशन भी है। नगर के बीचो-बीच राष्ट्रीय राजमार्ग है जो एक तरफ पटना-बेगूसराय जाती है। तो दूसरे तरफ मुगेंर-भागलपुर तथा हावड़ा (कोलकाता) के लिए वाया जसीडीह-आसनशोल जाती है। जबकि बड़हिया के पूर्वी भाग में गंगा नदी एवं उसका मैदान (दियरा) है। इस बीच की करीब 2200 बीघे दियारा की जमीन बड़हिया वासियों के अधीन है और पश्चिम में गंगा की सहायक नदी हरोहर का विस्तृत उपजाऊ मैदान है जिसका बिहार में कोई जोड़ नहीं है। यह क्षेत्र बड़हिया टाल के नाम से जाना जाता है जो 8 मील पश्चिम स्थित पाली गांव तक और उत्तर कोनी से मोकामा टाल को छूता है। दक्षिण 9 मील पर मानपुर गाँव तक का क्षेत्र बड़हिया टाल के नाम से विख्यात है। लगभग 60 वर्गमील का यह क्षेत्र एक लाख बीघे का बतलाया जाता है।
इस धरती को कभी जमीनदारों की बस्ती के रूप जाना जाता था, तो कभी छोटी अयोध्या के रूप में, कभी पहलवानी के लिए, कभी बहादुरी के लिए, तो कभी स्वतंत्रता संग्रामियों के गढ़ के रूप में, कभी समाजवादी नेता के रूप् में, यहाँ ललित विजय सिंह जैसे आई०पी०एस० अधिकारी (DG बिहार पुलिस) जो बाद में भारत के रक्षामंत्री भी बने थे उनकी जन्मभूमि रही है। वर्तमान में इसी बड़हिया की धरती के लाल श्री गिरिराज सिंह नवादा से लोकसभा चुनाव जीतकर भारत सरकार में केन्द्रीय मंत्री है। श्री सिंह भारत सरकार के MSME मंत्रालय के स्वतंत्र प्रभार के साथ केन्द्रीय उद्योग मंत्री है।

कभी इस गाँव को लोग गंगा, जमुना, सस्वती का संगम स्थल मानते थे। और यहाँ की बहादुरी के चलते लोग इसे बड़हिया = बड़+हिया यानि “बड़ा हदय” का लोग मानते थे। कहा जाता था की बड़हिया के मरद और वरद का कोई जोड़ नहीं। यह गाँव तपस्वीयों द्वारा बसाया गया एक बहादुरों का वास स्थान है, यहाँ के निवासी शक्ति के उपासक है। माँ बाला त्रिपुर सुंदरी मंदिर की भव्यता और पूजन अर्चना की व्यवस्था इसका प्रमाण है। बड़हिया के लोग धर्म साधक और संस्कारवान है। दर्जनों ठाकुरवाडि़यो में झूला अन्नकूट आदि अन्य धार्मिक अनुष्ठानों में मुक्त हस्त से व्यय किया करते है। मंदिरो के निर्माण, जीर्णोद्धार और पुर्ननिर्माण इसकी आस्था का माणदंड कहा जा सकता है।

बड़हिया की मिट्टी का ही प्रभाव रहा है कि यहाँ के लोग किसी की अधीनता स्वीकार नहीं करते “सम्मान रक्षार्थ” प्राणाहुति भी तुच्छ मानते है। इसलिए शायद स्वतंत्रता संग्राम में बड़हिया अग्रणी रहा है। बड़हिया माँ लक्ष्मी, सरस्वती और दुर्गा-काली के वरद पुत्रों की नगरी है। इसकी पहचान राष्ट्रीय – अंतराष्ट्रीय स्तर पर है। बड़हिया की संस्कृति और इसकी विरासत पर हमें गर्व है। गंगा के किनारे बसे इस बड़हिया गाँव नगर में संस्कृती की दो धाराऐं बहती है पहला-  ज्ञान और दूसरा- शक्ति की बड़हिया की ख्याति शक्तिपीठ के रूप में भी है और ज्ञानपीठ के रूप में भी और इन दोनो धाराओं में विशिष्टता है संस्कृति की दो प्रवाहमान धाराऐं शायद ही कहीं मिलती है। शक्तिपीठ के रूप में यहाँ माँ जगदम्बा स्थान (महारानी स्थान) है जहाँ माता के विभिन्न रूपो की पूजा अर्चना होती जिसके कारण बड़हिया का नाम “शक्तिधाम बड़हिया” पड़ा। बड़हिया को “छोटी अयोध्या” भी कहा जाता है। यहाँ महारानी स्थान के अलावे साठ से ज्यादा ठाकुरवाड़ी और अनेक मंदिर है। एक समय बड़हिया रामायणियों का गढ माना जाता था। सम्पूर्ण रामचरित मानस को कंठ में धारण करने वाले यहाँ के मनीषी विद्वान कथा वाचक के ज्ञान का लोहा देश के सुप्रसिद्ध मानस मर्मज्ञ विद्वान भी मानते थे।
यहाँ के व्याख्याकारों और प्रवचन कर्ताओ ने मानस के गूढार्थ को उछघटित कर प्रभूत ख्याति अर्जित की। यहाँ एक से एक छोटे बडे़ सौ से ज्यादा देवी मंदिर है, और एक से एक विद्वान भक्तगण भी पड़े हुए है, यहाँ एक ऐसे भक्तगण थे जो गंगोत्री से रामेश्वरम दंडवत करते हुए (कष्टी देते हुए) चले गए थे। इसके अलावा यहाँ हनुमान जी का बड़ा प्रतापी मंदिर है जिसे महावीर जी ठाकुरवाड़ी के नाम से जाना जाता है। इसके अलावा गाँव के पश्चिम किनारे में माँ काली का सिद्धपीठ है जहाँ से लोग कभी निराश नही लौटते है। इस तरह पतित पावनी भगवती गंगा के तट पर बसा हुआ बड़हिया नगर साहित्य, संस्कृति और धर्म का केंन्द्र रहा है। छोटे बड़े सौ देव मंदिर इसकी आध्यात्मिक चेतना को मुखरित करते रहे है।
कहा जाता है कि बड़हिया के मरद और बरद का कोई जोड़ नही। यहाँ के लोग बहुत ही ताकतवर और बलशाली होते है। यहाँ की पहलवानी और अखाड़े देश भर में चर्चित रहे है यहाँ के पहलवान राष्ट्रीय स्तर पर लड़ते थे और राष्ट्रीय स्तर की कई प्रतियोगिताओं यहाँ आयोजित होती रही है। एक जमाने में यहाँ फुटबाल बहुत ही लोकप्रिय था, बड़हिया स्थित हा हा बंगला में नेशनल स्पोटिंग क्लब की स्थापना कर पंजाब, बंगाल, महाराष्ट, लाहौर, सहित भारत के विभिन्न भागों से स्वतंत्रता संग्राम के क्रांतिवीर फुटबॉल खिलाड़ी के रूप में हा-हा बंगला आते थे, और फुटबॉल टूर्नामेंट में खेल दिखा कर स्वतंत्रता संग्राम का संदेश आम लोगो तक देते थे। फुटबाल के लिए स्थानीय संपन्न लोगों ने लगभग 7 एकड़ जमीन का एक टुकड़ा दान दिया था जो आज बड़का फिल्ड नाम से N.H 80 के किनारे पाया जाता है और श्री जगदम्बा नेशनल स्पोटिंग क्लब के बैनर तले फुटबॉल टूर्नामेंट आयोजित कराता आ रहा है।

1898 ई० में क्रांतिवरों ने अंग्रेजी शिक्षा का ज्ञान क्रांतिकारियो में होना आवष्यक समझ कर अपनी कमिटी के बैठक में देश के चिन्हित स्थानों पर हाई र्इगलिश स्कूल खोलने का निर्णय लिया था क्रांतिकारियो का गढ माने जाने वाले बड़हिया में हाई 0र्गलिश स्कूल खोलने की जिम्मेवारी जन सहयोग के बल पर हा-हा बंगला से संचालित अभियान के तहत 1912 ई० के प्रारंभ तक दो विशाल छात्रावास एक बड़ा एवं दो छोटा खेल मैदान एक बड़े जमीन के एक चौकड़ टुकड़े पर एक चार दिवारी के अंदर बन कर तैयार हो गया।

1921 में हा-हा बंगला में राष्ट्रीय विधालय की स्थापना हुई। 21अक्टूबर 1923 में हा-हा बंगला में श्री जगदम्बा हिन्दी पुस्तकालय की स्थापना क्रांतिवीरो ने की थी। 1925-1929 तक इसके वाषिकेात्सव होते रहे जो गाँव का प्रभावशाली समारोह होता था। 1929 के 11 और 12 अप्रैल को इसके वार्षिकत्सव में स्वतंत्र भारत के प्रथम राष्ट्रपति डा० राजेन्द्र प्रसाद मुख्य अतिथि के रूप् में पधारे थे। राजेन्द्र बाबू के अतिरिक्त डा० श्री कृष्ण सिंह, कृष्ण बल्लभ भाई सहाय राष्टकवि रामधारी सिंह दिनकर गोपाल सिंह नेपाली रामदयाल पाण्डेय के अतिरिक्त रामगोपाल रूद्र आदि अक्षर पुरूषो ने अपनी गरिमामयी उपस्थिति से पुस्तकालय के वाषिकोत्सव में प्राण फूंके थे। 12 अप्रैल 1929 को डा० राजेन्द्र प्रसाद ने हा-हा बंगला से संचालित विदेशी वस्त्र और मादक दृव्य का बहिष्कार आंदोलन का नेतृत्व किया था। 1936 में राष्ट्रीय स्तर पर संचालित किसान आंदोलन चरमदर आया तो किसान नेता स्वामी सहजानंद सरस्वती कार्यानंद शर्मा विद्वान राहुल संस्कृत्यायन गंगाशरण सिंह, जय प्रकाश नारायण, डां राम मनोहर लोहिया, किशोरी प्रसन्न सिंह सरीखे अग्रणी नेता हा-हा बंगला में प्रवास कर आंदोलन को गति देने का काम किया था। बिहार के प्रथम मुख्यमंत्री डा० श्री कृष्ण सिंह ने भी काफी समय तक बड़हिया को ही अनी भूमि बनायी थी। बड़हिया में स्थित हा-हा बंगला स्वतंत्रता आंदोलन में गांधी युग के पहले ही पूर्व आंदोलन के गढ़ के रूप में प्रसिद्ध हो चुका था।

अछूत उद्वारक की भूमिका में महात्मा गाँधी जब आस्था का केंद्र वैधनाथ धाम के पवित्र मंदिर में हरिजन प्रवेश कराने का कार्यक्रम तय किया था तो देवघर के पुजारी पंडा सहित छुआछुत को मानने वाले दबंगो ने इसके मुखर विरोध करने की घोषणा की थी। महात्मा गांधी ने डॉ० श्री कृष्ण सिंह के द्वारा वैधनाथ धाम मंदिर में हरिजन प्रवेश वाले कार्यकम को सफल बनाने में बड़हिया के लोगे से मदद मांगी बड़हिया के लोग बड़ी संख्या मे जाकर अंहिसक आंदोलन के पुरोधा महात्मा गांधी को जसीडीह स्टेशन से वैधनाथ धाम मंदिर तक सुरक्षित प्रवेश दिलाने में अहम भुमिका निभाई। प्रत्यक्ष दर्शियों की माने तो अगर बड़हिया के लोग अपनी जान की बाजी लगाकर महात्मा गांधी को नही बचाते तो उसी दिन महात्मा गांधी की हत्या हो गयी होती , मगर बड़हिया के क्रांतिवीरों ने मानव श्रिंखला बनाकर अपने शरीर पर लाठी-भाला का प्रहार सहते हुऐ उसके बीच से महात्मा गांधी को जसीडीह से देवघर मंदिर में प्रवेश करा दिया। एक जगह महात्मा गाँधी के बुरी तरह घिर जाने के बाद बड़हिया के कामता पहलवान इन्हे गोद में लेकर मीलों भागे और आक्रमणकारियों की पहुँच से महात्मा गाँधी को दूर ले गये । राजनीतिक टीकाकरों की माने तो महात्मा गाँधी ने बड़हिया वासियो के त्याग और बलिदान को महसूस किया और इतिहाकारों की खोजिस्ता माने तो बड़हिया शुरू से ही अन्याय के खिलाफ और स्वतंत्रता का पक्षधर रहा है।
बड़हिया में कृषि और पशुपालन मुख्य पेशा रहा है हजाड़ो एकड़ रकवा का टाल पूरे विश्व में जाना जाता है, यहाँ दूध की नदी बहती रही है। दूध और चना का मुख्य उत्पादक गाँव बड़हिया अपने आहार में भी इसे शामिल कर रखा है। दूध की बहुयातता के कारण यहाँ का रसगुल्ला भी उतना ही स्वादिष्ट और लोकप्रीय रहा है पूरे बिहार और अनेक राज्य के लोग यहाँ से रसगुल्ला खाने एवं खरीदकर ले जाते या मंगवाते है, यहाँ की सांझी संस्कृति ने बड़हिया का उत्तरोतर विकास कराया।

शिक्षा राजनीति , खेल,साहित्य , संगीत आदि में यहाँ के लोगो ने दुनिया में अपने झंडे गाड़े है। यहाँ की शिक्षा और संस्कृति ने सैकड़ो किलोमीटर तक के गाँवो को प्रभावित किया। इसमें समूचा लखीसराय जिला थोड़ा मुंगेर व पटना जिला शामिल है, आसपास के इलाके में भी ज्ञान की ललक पैदा की। बड़हिया की संस्कृति ने बड़हिया को ही नही पूरे बिहार को प्रभावित किया।

बड़हिया की सांझी संस्कृती में अनेक वीर, ज्ञानी, महापुरूष, योद्धा एवं दानवीर पैदा हुए जो हदय से ज्ञान, दान व पुण्य किये । यहाँ का झूला कत्वाली गीत संगीत के साथ दूर्गा पूजा का मेला देखने लायक था। जरूरत है अपने साझी संस्कृती को बचाने की यहाँ के लोग जो देश दुनिया में नाम रौशन कर रहे है साल में दो दिन भी बड़हिया को दें सके तो इसके गौरव को चार चांद लग जाएगें।
बड़हिया के भूमी पुत्रों पर हमें गर्व है, मैं इस धरती को प्रणाम करता हूँ। सुनता हूँ बड़हिया के लोग इस धरती को इसलिए चुना था रहने बसने के लिए की जब इनके पूर्वज आये थे और जब देखा चूहा, बिल्ली को खदेड़ रहा है तो कहा यह मिट्टी बड़ी बुलंद है बड़ी मजबूत है और यहीं बड़हिया को बसा लेने का काम करो हे बड़हिया के लोगों,
बड़हिया नाम यानि जिसका हिया- ह्रदय बड़ा हो, जिसका कलेजा इतना चौड़ा हो जिसमें सब समा जाए। जिसमें सबको समेट लेने का काम करता हो, जो शंखनाद करता हो।

जिसके घर में , ठाकुरवाड़ी में शंख की ध्वनि निकलता हो घडि़याल की ध्वनि निकलता हो, तो वह आवाज देता हो की हे बड़हिया के गरीब बड़हिया के गुरूबे बड़हिया के कम पैसे वाले, बड़हिया के गरिमान, बड़हिया के लाचार गरीब अमीर लोग हम सब भाई है, हम सब बहन है, हम एक ही मिट्टी के पुतले है जो किसी को बड़ा और किसी को छोटा नहीं मानता हो वह बड़हिया की धरती है। मैं इस धरती को प्रणाम करता हूँ, और मैं खुशनशीब हूँ, भाग्यशाली हूँ की इस बड़हिया की इस पावन धरती पर मेरा जन्म हुआ और माँ जगदम्बा के बीच मैं आशीर्वाद लेने उपस्थित हुआ
”बड़हिया तो एक तीर्थ है एक तीर्थ है बड़हिया”
मैं इन्ही शब्दों के साथ अपने आलेख को खत्म करता हूँ माँ जगदम्बा को, बड़हिया को, बड़हिया के लोगो को शत शत नमन करता हूँ प्रणाम करता हूँ।

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