बड़हिया जाति, गोत्र, मूल

बड़हिया के मूल निवासी जाति के भूमिहार-ब्राह्राण मूल दिघवे और गोत्र के शांडिल्य है।

उनका मूल स्थान दिघवागढ़ , थाना मसरख जिला सारण है उक्त स्थान पर इनके राजभवन जलाशय इत्यादि के अवशेष अभी भी वर्तमान है।

परिचय:- जाति हिन्दी शब्दसागर 1825 के अनुसार जाति की परिभाषा है। :-

● जाति हिन्दुओं में मनुष्य समाज का विभाग के रूप मेंथा पर पीछे से प्रत्येक वर्ण में भी कर्मानुसार कोई शाखाएँ हो गई जो आगे चलकर भिन्न भिन्न जातियों के नाम से प्रसिद्ध हुई।

ॐ● श्रीमदभगवतगीता: “चातुर्वणा मया सृष्टा गुण कर्म विभागश:”

ळमारे पूर्वज इतिहास के नायक, जाति के भूमिहार किस वर्ण के है?  इनका दावा है की ब्राहाण है।

● स्वामी सहजानंद जी का भूमिहार ब्राहाण परिचय गंथ जो 1916 में प्रकाशित हुआ, उसके कुछ वचन नीचे है।

● डा० राय बहादुर हेमचन्द्र बसुु एडवोकेट की अप्रकाशित पुस्तक से ”बिहार की जनसंख्या में जनगणना के अनुसार मैथिलों की संख्या सर्वाधिक है, दूसरा स्थान चमारो का है। और तीसरा भूमिहार ब्राहणों का मुंगेर का है और तीसरा भूमिहार ब्राहाणो का मुगेंर जिला की जनता मं भूमिहारो की संख्या सर्वाधिक है अधिकतर बड़हिया, तेडस बरबीधा में और बेगूसराय अनुमंडल है। स्व० डा०के०पी० जायसवाल केमत में भूमिहार वैशाली के लिच्छवी के बंशज है।
ब्राह्राणो के उस वर्ग ने, जो अपने ब्रह्रार्षि अवतार पुरूष भगवान परशुराम का वंशज मानता रहा है, कृषि को अपने जीवकोपार्जन का मुख्य पेशा बनाया। बिहार एवं पूर्वी उत्तर प्रदेश में भूमिहार ब्राह्राण के नाम से जाना जाता है।

● भूमिहार शब्द का अर्थ संस्कृत व्याकरण के अनुसार ‘भूमि हरने वाला’ या “छीनने वाला” है या ‘भूमि को हार (माला) के समान गले लगाने वाला’ है। इन दोनो ही अर्थ के अनुसार वे वास्तव में भूमि के बड़े प्रेमी है जमीन की प्राप्ति या रक्षा के लिए कुछ भी करने को तैयार है।

● हिन्दी विश्वकोश: 16 सन 1928 ई० प्राचार्य विधा महाणव श्री नागेन्द्र नाथ वसु भूमिहार विबार प्रदेष वासी एक प्रकार के ब्राहण । ये लोग भूमिहार जमीनदार , बाभन, मधहिया-ब्राहण, अयाचक ब्राहाण और चौधारी नाम से जन साधारण में प्रसिद्ध है।

● हिन्दी शब्दसागर : 1925 नागरी प्राचारिणी सभा काशी
कुछलोग कहते है की जब भगवान परशुराम ने पृथ्वी को क्षतियो से रहित कर दिया, तब जिन ब्राहणो को उन्होने राज्य का भार सौंपा उन्ही के वंशधर ये भूमिहार या बाभन है।

”मानक हिन्दी कोश 1933 हिन्दी साहित्य सम्मेलन”:

● भूमिहार – एक ब्राहण जाति को जो प्राय उत्तर प्रदेश और बिहार में बसती है और प्राय: खेती-बारी से जिवीका निर्वाह करती है। पंजाब वीर जाति मोहियाल भी अपने को भूमिहार मानते है। उनका इतिहास ए सेनापति टी० पी० रसेल स्टेसी ने 1911 में लिखा थ्ज्ञा। उस पुस्तक में एक सूची उल्लेखनीय भूमिहारो की दी गई है।  जिसमें बड़हिया के भमीछन सिंह का नाम है। महाराष्ट के चितपावन, पंजाब के मोहियाल और दिल्ली के त्यागी औश्र तागा ब्राहण भी अपने को भूमिहार मानते है।

● स्वामी सहजानंद सरस्वती जो किसान अंदोलन के जनक कहलाए 1914 ई० में बलिया के अखिल भारतीय भूमिहार ब्राहण सभा में उस समय घोषणा की थी की पुरोहित कार्य छोड़कर कृषिकार्य करने के कारण भूमिहार ही श्रेष्ठ अयाचक ब्राहण है, ये वाराणसी से प्रकाशित भूमिहार ब्राहाण पत्रिका के प्रमुख स्तंभ थे।

● 1892 ई० में लंगट सिंह के सभापतित्व में एक जातीय सभा का संगठन हुआ। जिसका नाम प्रभावशाली काशीनरेष महाराजा सर प्रभुनारायण सिंह के इच्छानुसार ”भूमिहार ब्राहण महासभा” रखा गया। भूमिहार संस्कृत शब्द है और इसका पर्यावाची है जमीनदार। प्राचीन बिहारी नाम बाभन के बदले संयुक्त प्रांत से भूमिहार लाया गया।

गाजीपुर के जिला गजेटियर के पृष्ठ 164 से:

● आइने अकबरी से ये जाहिर होता है की ये जमीनदार ब्राहण थे जिस नाम से भूमिहार जाने जाते है। मदन बनारस के जमीनदार ब्राहण थे अर्थात भूमिहार थे। 18 वीं शताब्दी के एक केश में कलकता सुप्रीम कोर्ट से अपील हुई क्या भूमिहार (बाभन) पूर्व ब्राहाण हैं ?

● इसके लिए विद्वान पंडित सब जूरी में बैठाए गए उनका सर्व सम्मत मत था की बाभन- भूमिहार ब्रहाण एक ही जाति के भिन्न नाम है।

● भूमिहार ब्राह्राणों के भूमिपति होने के बहुत से कारक है। भगवान परशुराम ने क्षत्रिय का विनाश कर उनकी भूमि कश्यप आदि ब्राह्राणों को दी थी, यह सर्वविदित है। कुछ ब्राह्राणों को लोकहितकारी सेवाओं के कारण राजवंशो से भूमि अग्रहार के रूप में प्राप्त हुई। प्राचीन काल में कुछ राजवंश ब्राह्राणों के थे। जैसे- शुंग, कण्व, सातवाहन, गुप्त इत्यादि। आज के भूमि हार ब्राह्राणों में से कुछ उन्हीं प्राचीन राजवंशो की परम्परा में है। भूमिहार ब्राह्राणों में चनकिया, सुंगनिया और कण्वायन इन्हीं प्राचीन राजवंशो के अवशेष है। चनकिया चाणक्यवंशी ब्राह्राण हैं, सुंगनिया और कण्वायन का सम्बन्ध् शुंगवंश तथा कण्ववंश से है। ;शुंगवंश में पुष्यमित्रा सबसे प्रसिद्व राजा हुए हैद्ध। इस वर्ग में कुछ ऐसे ध्र्माचार्यो के वंशज भी समिमलित हैं जो शिक्षण संस्थाओं के संचालन हेतु भूमि ले लेते थे। प्राचीन राजवंशी के उच्च पदाधिकारी, प्रशासक तथा सेनापति भी इस वर्ग में समिमलित हुए है। भूमिहार ब्राह्राणों को शताबिदयों की इस ऐसतिहासिक प्रकि्रया से भूमि प्राप्त हुई है। इस वर्ग के अधिकांश लोगो ने अपने बाहुबल और पुरूषार्थ से भुमि अर्जित की है।

अखिल भारतीय भूमिहार ब्राह्मण महासभा

भूमिहार ब्राह्राण शब्द के प्रचलित होने की कथा भी बहुत रोचक है। सन 1885 में बनारस के महाराज ईर्श्वरी प्रसाद सिंह ने बिहार एवं उत्तर प्रदेश के जमीनदार ब्राह्राणों की सभा बुलाकर प्रस्ताव रखा कि हमारी एक जातीय संगठन होनी चाहिए। संगठन बनाने के प्रश्न पर सभी सहमत थे। परन्तु संगठन का नाम क्या हो इस प्रश्न पर बहुत ही विवाद उत्पन्न हो गया। मगध् के बाभनों ने जिनके नेता स्वर्गीय कालीचरण सिंह थे, संगठन का नामकरण ‘बाभन सभा करने का प्रस्ताव रखा। स्वयं बनारस महाराज ईर्श्वरीय प्रसाद सिंह ‘भूमिहार ब्राह्राण सभा नाम के पक्ष में थे। बैठक में नाम के संबंध् में आम राय नही बन पाई। अत: नाम पर विचार करने हेतु एक उपसमिति की अनुशंसा पर ‘भूमिहार ब्राह्राण शब्द को स्वीकृत किया गया और इस शब्द का प्रचार-प्रसार करने का निर्णय लिया गया। इसी वर्ष महाराज बनारस तथा स्वर्गीय लंगट सिंह के सहयोग से मुजफ्रपफरपुर में भूमिहार कालेज खोला गया। बाद में तिरहुत कमिश्नरी के कमिश्नर का नाम जोड़कर इसे जी.बी.बी. कालेज के नाम से पुकारा गया। आज वही जी.बी.बी. कालेज लंगट सिंह कालेज के नाम से प्रसिद्व है।

● भूमिहार ब्राह्राण एवं इसके समरूप आयाचक ब्राह्राण पूरे भारत में विभिन्न नामों से जाने जाते है। जिसका प्रचार-प्रसार होने से एक-दूसरे में शादी सम्बन्ध् शुरू हो रहा है। पूरे देश के विभिन्न प्रान्तों में अयाचक ब्राह्राण निम्नलिखित नामों से जाने जाते है।

1. बिहार एवं पूर्वी उत्तर प्रदेश में- भूमिहार

2. पंजाब एवं हरियाणा में – मोहयाल

3. जम्मू कश्मीर में – पंडित, सप्रू, कौल, नेहरू, दार, काटजू

4. मध्यप्रदेश, राजस्थान, उत्तर प्रदेश; आगरा के निकटद्ध-गालव

5. उत्तर प्रदेश में – त्यागी एवं भूमिहार।

6. गुजरात में – अनाविल; देसाई जोशी, मेहताद्ध

7. महाराष्ट्र में – चितपावन

8. कर्नाटक में – चितपावन

9. पशिचमी बंगाल – भादुड़ी, चक्रवर्ती, गांगुली, मैत्रा, सान्याल आदि।

10. उड़ीसा में – दास, मिश्र

11. तमिलनाडू में – अय्यर, आयंगर

12. केरल में – नंबूदरीपाद

13. राजस्थान में – बांगर, पुष्कर्ण, पुरोहिती, रंग एवं रूद्र, बागड़ा

14. आन्ध्रपदेश में – राव और नियोगी।

● ब्रह्रार्षि वंश की ये प्रजातियाँ भले ही देश के विभिन्न प्रान्तो में जा बसी हो लेकिन उनकी सांस्कृतिक परम्परा, रीति-रिवाज एवं जन्मजात प्रकृति की दृषिट में इनमें परस्पर आश्चर्यजनक समानता है, जैसे- त्यााग, बलिदान, निष्ठा, सेवाभाव, देश-प्रेम, कत्र्तव्यप्रियता, शूरता, मेधविता आदि गुण एवं विशेषता समान रूप में व्याप्त है। यही कारण है कि ब्रह्रार्षि वंश की ख्याति देश एवं दुनिया में व्याप्त है।

● इन विशेषताओं के अतिरिक्त ब्रह्रार्षियों में मूलभूत समानतायें है, जिसमें दान का परित्याग, कृषि कार्य एवं अन्य व्यवसाय जीविका के आधर,गोत्रों की समानता, परशुराम की उपासकता, प्रशासनिक, शैक्षणिक एवं सैन्य क्षेत्रों में दक्षता तथा शारीरिक संरचना की दृषिट से भी भूमिहार, त्यागी, मोहयाल, चितापावन एवं दक्षिण भारत सहित सभी अयाचक ब्राह्राणों में आश्चर्यजनक समानता है।

One thought on “Barahiya ke Bhumihar | बड़हिया जाति, गोत्र, मूल | All about of Barhiya | पूरे भारत में भूमिहारों का नाम”

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

error: Content is protected !!