आदिशक्ति महाकाली (ग्रामदेवी)

आदि शक्ति महाकाली ग्रामदेवी

बिहार राज्य के लखीसराय जिलान्तर्गत बड़हिया ग्राम अब नगर अपने गुण वैशिष्टय के आधार पर गाँवो का सिरमौर माना जाता है। यह नगर पवित्र गंगा के तटपर बसा हुआ है। यह सड़क मार्ग एवं रेल मार्ग दोनों से जुड़ा हुआ है। सम्पूर्ण गाँव देवी स्वरूपा बाला त्रिपुर सुंदरी की अलौकिक आभा से आलोकित है।

● इस गाँव के दक्षिण-पश्चिम में एक प्राचीन माँ काली का मंदिर अवस्थित है। मंदिर में अवतरित माँ काली को “ग्राम-देवी” के नाम से जाना व पूजा-अर्चना किया जाता है । इनकी स्थापना कब और किनके द्वारा हुई इसका स्पष्ट अभिलेख उपलब्ध नहीं है। जनश्रुति के आधार पर कहा जाता है कि इस मंदिर की स्थापना जय-जय ठाकुर व पृथु ठाकुर दोनों शाक्त बंधु जिन्हें धर्म में बड़ी निष्ठा थी और विविध शास्त्रों के ज्ञाता थे ने की है। पुराने दस्तावेजों से साबित होता है कि इन्द चौधरी भवन सन् 1612 ई० में जीवित थे, और उनके नाम से तौजी कायम हो गया था। जहाँ पर काली मंदिर प्रतिष्ठापित है वह टुकानाथ श्री रायबहादुर नम्बर 380 तौजी 10 थाना 186 अंकित है। इससे प्रमाणित होता है कि यह मंदिर तौजी कायम होने के पूर्व से ही है।

● मंदिर आवास से दूर निर्माण स्थान पर बना हुआ था। यह स्थान सांप-बिच्छुओं से आच्छदित था और अवसर विशेष पर ही साँप बिच्छुओं के भय से यहाँ के लोग माँ का पूजन अर्चन करते थे शायद माँ को यह स्वीकार नहीं था और एक नये अघ्याय का प्रारम्भ हुआ। संस्कृत पाठशाला के प्रधानाचार्य शक्तिनाथ चौधरी जी संस्कृत साहित्य के प्रकाण्ड विद्वान और काली के उपासक जो माला गूंथकर माँ को अर्पण करते थे, वह स्वत: उनके गलें में आ जाती थी।

● पक्की सड़क नागवती स्थान के पश्चिम वृक्षों के झुरमुट के बीच माँ का मंदिर अवस्थित है। मंदिर में प्रवेश करते ही सामने एक पीपल का वृक्ष दिखाई देता है, वास्तव में यहाँ एक सहोर का वृक्ष था। जिसपर पीपल का वृक्ष उत्पन्न हो गया था। तंत्रशास्त्र में ऐसे वृक्ष को वंदा कहते है। ऐसे वृक्ष का तंत्रशास्त्र में बड़ा बड़ा महत्व है। यदा कदा इस वृक्ष पर देवता के दर्शन होेते है। वृक्ष के दाहिने तरफ अनेक पिंडियो जो तीन भागो में बंटी हुई है। दक्षिण से घसराज, बीच में चतुष्ठयोगनी और अंत में जय जय ठाकुर और पृथु ठाकुर की पिंडी है। मंदिर के गर्मगृह में प्रवेश करते ही माँ का दर्शन अपनी बहनों के साथ होता है। उत्तर से उमा काक्ष्यायनी गौरी काली हेमवती ईर्श्वरी शिवा एवं अन्त में आनंद भैरव अलौकिक तेज के साथ बिराजते है। ऐसा माना जाता है कि गर्भगृह से बाहर निकालकर सच्चे मन से माँ का ध्यान लगाने से मनोवांछित फल की प्रापित होती है। वास्तव में देव प्रतिमा प्रतीक मात्र है इस प्रतीक का निहिर्थ हमारी मानसिक तरंगो से ब्रहमाण्ड के उसी भ्ज्ञाव की तरंगो को अमंत्रित करना होता है। ध्यान जितना गहरा होगा परिणाम भी उतना सुन्दर और श्रेष्ठ होगा। इसलिए कहा गया है कि भाव नही तो पूजा नहीं मानसिक एकाग्रता के अभाव में पूजा अर्थहीन है। मंदिर की भगतिनी एक दलित परिवार से आती है जो सामजिक सदभाव एवं समरसता का अनूठा उदाहरण है।

सती स्थान

राजा जी मंदिर के परिसर में बड़ पीपल के संयुक्त वृक्ष के नीचे सती माँ की पिण्डी है। पैराणिक मान्यता के अनुसार वृक्ष के नीचे पिण्डी का होना स्थान विशेष की पवित्रता औश्र आध्यातिमक शाक्ति का धोतक है। राजा जी के मंदिर का निर्माण मेरे पूर्वज किये थे। मेरे पूर्वज लाखपति सिंह एक धार्मिक स्वभाव के तथा अपनी स्पष्टवादिता के लिए जाने पहचाने जाते थे।

● आमजनों का मानना है कि सती माँ सोन्धी गाँव की थी। माँ का दर्जा होने के कारण सोंधी गाँव से विवाह संबंध बंद है। गाँव की महिलाएँ शुभ अवसर पर यहाँ पूजा अर्चना करती है।

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